अधूरे ख्वाब- मनोज शाह

110

अधूरे ख़्वाब थे और नदी से मिले
इस तरह से हम आप ही से मिले

यूँ उम्र तो काट ली हमने तन्हाई में,
आखिरी वक़्त में जिन्दगी से मिले

प्यास कोई कभी भी बुझा न सका,
कितने दरिया मेरी तिश्नगी से मिले

सुफियों की दुआ तो रही है यही सदा,
जलता सूरज कभी चाँदनी से मिले

देखना हो अगर मेरे वो महबूब को,
कोई आकर मेरी ये बेखुदी से मिले

कोई दिल से न मिल पाया उसके सिवा,
वरना मिलने को हम हर किसी से मिले

मुझमें खुद को ही ढूंढा किए उम्र भर,
यहां लोग जितने मेरी शायरी से मिले

-मनोज शाह मानस
सुदर्शन पार्क, मोती नगर,
नई दिल्ली