तीन मुक्तक- मेधा आर्या

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सतत् अर्णव पखारे पग, शिरो गिरि मुकु सुहाते हैं
पवित्र नदियों की कल-कल जीव खग मृदु गीत गाते हैं
अनेकों वेषभूषा धर्म भाषा हैं जहाँ मनहर-
वही प्रिय देश है मेरा उसे भारत बुलाते हैं

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बनी जग में जहाँ से साख, प्यारा देश भारत है
मुझे अति गर्व जिसपर वो, दुलारा देश भारत है
जहाँ खिलती शहीदों-सन्त, पर्वों देव से धरती-
सजा गुलदान वीरों से वो न्यारा देश भारत है

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पड़े संकट घड़ी जब भी, दिये एका के जलते हैं
सहज घर-घर से राणा, लक्ष्मी झाँसी निकलते हैं
जनम जब-जब दुबारा लूँ, यहीं भारत में हो मेरा-
करूँ जीवन निछावर देश पर, अरमाँ मचलते हैं

-मेधा आर्या