बहती नदिया की धारा-सा- स्नेहलता नीर

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मोहपाश सब काट जगत के, अब स्वतंत्र हो जाओ
मुक्त उड़ानें भरते पंछी, जैसा अंबर पाओ

बहती नदिया की धारा-सा, इस जीवन का चलना
शूल बिछे हों पथ पर चाहे, नहीं कभी भी रुकना
काँटे सभी कुचलकर हिम्मत, रख कर कदम बढ़ाओ

कुंठाओं के व्याल विषैले, चिंतन में मत पालो
आँधी में भी आशाओं का, दीप हृदय में बालो
भले जगत बैरी बन जाये, तनिक नहीं घबराओ

राग-द्वेष,छल-बल से लिपटे, नेह-सरित है सूखी
जिह्वा का बर्ताव कटारी, बोली-भाषा रूखी
निश्छल प्रीति-रीति जगती में, जन-जन को सिखलाओ

चाह अगर हो प्रबल पथिक की, राहें सब खुल जातीं
दुष्कर सभी मंज़िलें उसको अपने निकट बुलातीं
नतमस्तक हो सारी दुनिया, वह इतिहास बनाओ

जाति-धर्म की जंजीरों में, आज तलक क्यों जकड़े
स्वार्थ-सिद्धि के लिए खून की, होली रगड़े-झगड़े
मानवता का पाठ पढ़ाओ, सबको गले लगाओ

-स्नेहलता नीर