1857 का विद्रोह: स्वतंत्रता संग्राम या सैनिक विद्रोह- मोहित कुमार उपाध्याय

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1757 की प्लासी विजय से लेकर 1857 के सैनिक विद्रोह तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस समय के लगभग संपूर्ण भारत पर, अपनी साम्राज्यवादी नीतियों और प्रगतिशील जाति के मुखौटे के बल पर, अपना राजनैतिक नियंत्रण स्थापित कर लिया था, जिसके परिणामस्वरूप भारत की आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों को ईस्ट इंडिया कम्पनी अपने हितों को ध्यान में रखकर तैयार करती थी और दुर्भाग्य की बात यह हैं कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के इन 100 वर्षों के शासनकाल में भारतीयों को लगभग 12 बड़े अकालों का सामना करना पड़ा जो अपने आप में इस तथ्य को प्रदर्शित करता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीय जनता को अपने वादे के विपरीत सभ्य बनाने के लिए नहीं वरन् भारत पर साम्राज्यवाद का शिकंजा कसने के लिए पैर पसार रही थी।
अंग्रेजों की इस बढती धनलोलुपता का भारत के लगभग सभी वर्गों रियासतों के राजा, सैनिकों, जमींदारों, कृषकों, श्रमिकों, व्यापारियों, दुकानदारों, ब्राह्मणों, मौलवियों, केवल उस पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त वर्ग को छोड़कर जो अपनी जीविका के लिए कंपनी पर निर्भर था, पर प्रभाव पड़ा।
सब जानते हैं कि अंग्रेजों ने इन दिनों क्या गंदे तरीके अपनाए। पहले तो उन्होंने सारी हिंदुस्तानी सेना का धर्म नष्ट कर दिया और फिर लोगों को अनिवार्य रूप से ईसाई बनने पर मजबूर किया। इसलिए हम पूरी तरह अपने धर्म पर कायम रहते हुए, लोगों के साथ एकजुट हुए हैं और हमने किसी म्लेच्छ को जीवित नहीं छोड़ा है और इस बुनियाद पर हमने दिल्ली का शासन फिर से स्थापित किया है। 10 मई 1857 को जब मेरठ के सैनिकों ने चर्बी वाले कारतूसों का उपयोग करने से इंकार करने के पश्चात् विद्रोह कर दिया और विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली आकर मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए राजी कर लिया और मुगल सम्राट को शहंशाह ए हिन्दुस्तान घोषित कर दिया। तत्पश्चात विद्रोही सैनिकों द्वारा दिल्ली घोषणा पत्र के नाम से यह पत्र जारी किया गया।
इस घोषणा पत्र से स्पष्ट होता हैं कि यह विद्रोह केवल चर्बी वाले कारतूसों का परिणाम मात्र नहीं था, बल्कि वह अपने अंदर अनेक राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक कारणों को समेटे हुए था जो ईस्ट इंडिया कंपनी के पिछले सौ वर्षों के साम्राज्यवादी शासन में छिपे हुए थे।
यह ईस्ट इंडिया कंपनी की महत्वाकांक्षी आर्थिक नीतियों और साम्राज्यवादी शासन के प्रति साधारण नागरिकों की दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही घृणा का परिणाम था। साधारण जनता की नफरत का मुख्यतः कारण अंग्रेजों द्वारा देश का आर्थिक शोषण और भारत की परंपरागत मजबूत ग्राम अर्थव्यवस्था को नष्ट कर देना था जिसके परिणामस्वरूप कृषकों, श्रमिकों, हस्तशिल्पियों, परंपरागत जमींदारों एवं समाज के गणमान्य लोगों को निर्धनता के चूल्हे में झोंक दिया गया।
इसके अलावा अंग्रेजों की राजस्व संबंधी नीतियां और कानून एवं प्रशासनिक नीतियां इस विद्रोह के अन्य कारणों में शामिल की जाती है। क्योंकि अंग्रेजों ने अपनी बढ़ती धनलोलुपता को पूरा करने के लिए कृषि पर अधिक कर वसूलना शुरू कर दिया और इसके लिए उन्होंने जमींदारी व्यवस्था, रैयतवारी व्यवस्था एवं महालवाडी व्यवस्था का निर्माण किया जिनमें किसानों पर कर की मात्रा को बढा दिया गया और उनसे वसूली भी अधिक कड़े तरीके से की जाने लगी जिसमें यह प्रावधान था कि एक निश्चित तिथि को अगर सूर्यास्त के पश्चात् लगान जमा नहीं किया गया तो भूमि से बेदखली की आशंका बढ़ जाती थी। वहीं कर वसूली के इस कार्य की जिम्मेदारी परंपरागत जमींदार के स्थान पर उन सूदखोरों और व्यापारियों को सौंप दी गई जिनका खेती-बाड़ी से कोई खास संबंध नहीं था इसलिए इन नये मध्यस्थों ने लगान को अवैधानिक रूप से अत्यधिक बढाकर किसानों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया।
1857 के विद्रोह के संबंध में इतिहासकारों के संबंध में मतभेद हैं और सभी इतिहासकारों ने इस पर भिन्न भिन्न मत प्रकट किए हैं, जिसका विश्लेषण करना लेख का मुख्य और एकमात्र उद्देश्य है।
अंग्रेजी इतिहासकारों ने इसे केवल सैनिक विद्रोह के रूप में देखा है। ऐसा विद्रोह जो केवल सेना तक सीमित था और जिसे जनसहयोग प्राप्त नहीं हुआ।
समकालीन कुछेक भारतीय विचारकों के दृष्टिकोण से भी यह केवल एक सैनिक विद्रोह ही था जिसमें आम जन की कोई भागीदारी नहीं दिखाई पड़ी।नऐसे विचारकों में मुंशी जीवन लाल और मोईनुद्दीन, दुर्गादाश वंधोपाध्याय और सर सैय्यद अहमद खाँ अग्रणी नाम शामिल है। अन्य लोगों ने इसे ईसाइयों के विरुद्ध धार्मिक युद्ध की संज्ञा दी। वहीं कुछ अन्य लोगों ने इसे अंग्रेजी राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए हिन्दू मुस्लिम षडयंत्र का परिणाम बताया। इसके अलावा कुछ ऐसे लोग थे जिन्होंने इसे पाश्चात्य तथा पूर्वी सभ्यता और संस्कृति के बीच संघर्ष के रूप में देखा।
कुछ राष्ट्रवादी भारतीय इसे सुनियोजित राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष की संज्ञा प्रदान करते हैं जिनमें विनायक दामोदर सावरकर का नाम अग्रणी है।
सावरकर ने इस विद्रोह से जुड़ी सभी घटनाओं को जोड़कर 1857 का स्वातंत्र्य समर के शीर्षक के साथ एक पुस्तक का रूप दिया और उनकी पुस्तक की शुरूआत कुछ इस प्रकार की पंक्तियों से होती हैं । आज 10 मई है। 1857 के स्मरणीय वर्ष में आज के दिवस ही, ओ हुतात्माओं! आपके द्वारा भारतवर्ष की रणभूमि में स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम अभियान का सूत्रपात किया गया था। अपनी पतनकारी दासता के भाव से जाग्रत हो हमारी मातृभूमि ने अपना खड्ग निकाल लिया था और बेड़ियों को भंग करते हुए अपनी मुक्ति और सम्मान हेतु प्रथम प्रहार किया था। आज ही के दिवस ‘मारो फिरंगी को’ का रणघोष कोटि – कोटि कंठो से गूंज उठा था। आज ही के दिवस मेरठ के सिपाहियों ने भयानक विद्रोह में शामिल होते हुए दिल्ली की ओर कूच किया था और सूर्य के प्रकाश में झिलमिलाते यमुना जल के दर्शन किए थे और उन ऐतिहासिक पलों को आत्मसात किया था तथा प्राचीन युग का अवसान कर नए युग का उदय किया था और “एक ही पल में अपने नेता, ध्वज तथा एक कारण को प्राप्त कर लिया था और सैनिक विद्रोह को एक राष्ट्रीय व धार्मिक संग्राम में परिवर्तित कर दिया था”
इन उपरोक्त पंक्तियों से स्पष्ट होता हैं कि वीर सावरकर के मन में विद्रोही सैनिकों के मन में न केवल गहरा सम्मान था बल्कि उन्होंने इन विद्रोही सिपाहियों की शौर्य गाथा के सहारे अंग्रेजी औपनिवेशिक शक्ति का दमन करने के लिए भारतीय जनमानस को इस सैनिक विद्रोह को स्वतंत्रता संग्राम के रूप में परिचित कराया।
इस विद्रोह का अंग्रेजी सरकार के मन पर कितना गहरा खौफ था, यह इस तथ्य से स्पष्ट होता हैं कि ब्रिटिश सरकार ने सावरकर द्वारा 1857 के विद्रोह के संदर्भ में लिखी जा रही इस पुस्तक को प्रकाशित होने के पहले ही प्रतिबंध लागू कर दिया था।
सर जाॅन लारेंस और सीले के अनुसार यह केवल एक सैनिक विद्रोह था। सर सीले का यह मानना हैं कि यह विद्रोह एक पूर्णतया देशभक्ति रहित और स्वार्थी सैनिक विद्रोह था, जिसमें न कोई स्थानीय नेतृत्व ही था और न ही इसे सर्वसाधारण का समर्थन प्राप्त था। यह एक संस्थापित सरकार के विरुद्ध भारतीय सेना का विद्रोह था।
इस संदर्भ में निस्संदेह यह बात सत्य हैं कि 1857 का विद्रोह एक संस्थापित सरकार के विरुद्ध भारतीय सेना के विद्रोह के रूप में आरंभ हुआ परंतु यह सभी जगह केवल एक सैनिक विद्रोह के रूप में ही सीमित नहीं रहा और न ही इस विद्रोह में सभी भारतीय सेना ने विद्रोहियों का साथ दिया। तत्कालीन समाज के प्रत्येक वर्ग से लोग विद्रोह में शामिल हुए और सैनिकों द्वारा अंग्रेजी सत्ता समाप्त किए जाने के पश्चात हथियार लेकर उठ खड़े हुए। किसानों, श्रमिकों, दस्तकारों, दुकानदारों, परंपरागत जमींदारों ने बड़ी बहादुरी और खूबसूरती के साथ विद्रोह का संचालन किया और विद्रोह को एक विशिष्ट स्वरूप यानि जन विद्रोह का चरित्र प्रदान किया। इन विद्रोहियों ने विद्रोह का लाभ उठाकर सूदखोरों और जमींदारों पर हमला किया और उनकी खाता बहियों और कर्जों के दस्तावेजों को जलाकर राख कर दिया। इनके भय का यहीं एकमात्र कारण था कि समाज के इन वैभव संपन्न मध्यम वर्गीय लोगों ने विद्रोहियों का साथ न देकर अंग्रेजों के हित में ही अपना हित समझा।
इन विद्रोहियों ने पुलिस थानों, अदालतों, मालगुजारी के दस्तावेजों और तहसीलों पर भी आक्रमण किया ताकि सत्ता की प्रतीक इन सरकारी इमारतों एवं संपत्ति को अधिक से अधिक नष्ट किया जा सके। इसके अलावा जहाँ जनता विद्रोह में शामिल नहीं हुई, वहां उसने अंग्रेजी सेना के साथ सक्रिय शत्रुता का व्यवहार किया अर्थात अंग्रेजी सेना को विद्रोहियों से जुड़ी सूचना देने से इंकार कर दिया या फिर गलत सूचना देकर उन्हें गुमराह किया।
इस संदर्भ में 1858-59 में लंदन टाइम्स अखबार के संवाददाता डब्लू एच रसल ने लिखा कि कोई भी मिसाल ऐसी नहीं कि किसी गोरे की गाड़ी पर दोस्ताना निगाह पड़ती हो। उफ्फ! ये आंखों की भाषा! शक की गुंजाइश कहां है? यही तो वह चीज है, जिससे मैंने समझा कि हमारी जाति का अक्सर बहुत से लोगों को कोई डर नहीं होता और यह कि नफरत तो इससे सभी करते हैं ।
एल ई आर रीज के अनुसार यह धर्मान्धों का ईसाइयों के विरुद्ध युद्ध था। इस कथन से पूरी तरह सहमति व्यक्त नहीं की जा सकती हैं क्योंकि अंग्रेजी सेना तथा विद्रोही दोनों ही पक्षों ने जातीय अंहकार के वशीभूत होकर युद्ध नीति का उल्लघंन किया था। जिस धार्मिक कारणों से आहत होकर सैनिकों ने विद्रोह किया था, उन्हीं गाय तथा सूअर के कारतूसों का प्रयोग विद्रोहियों ने अंग्रेजी सेना के खिलाफ किया था। दोनों ही पक्षों ने अपनी ज्यादतियों को छिपाने के लिए अपने अपने धर्म ग्रंथों का सहारा लिया। दूसरी ओर एक तथ्य यह भी हैं कि सेना में शामिल सभी भारतीय सिपाहियों ने विद्रोह नहीं किया था। इस विद्रोह को कुचलने में अंग्रेजी सैनिकों से कहीं ज्यादा भारतीय सैनिकों की संख्या अधिक थी, इसलिए यह तर्क कि यह धर्मान्धों का ईसाइयों के विरुद्ध युद्ध था, पूरी तरह अस्वीकार किए जाने योग्य है।
टी आर होम्ज का यह तर्क कि यह बर्बरता तथा सभ्यता के बीच युद्ध था। यह अस्वीकार किए जाने के योग्य हैं क्योंकि विद्रोह में दोनों ही पक्ष अत्याचार के दोषी है। जहाँ विद्रोही इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ में यूरोपीय स्त्रियों और बालकों के हत्या के दोषी थे। वहीं अंग्रेजी सेना में हडसन और नील ने कायरता और बर्बरता की सीमा को पार ही कर दिया।
हडसन ने विद्रोह के दौरान दिल्ली में अंधाधुंध गोलियां चलाईं। जनरल नील ने इलाहाबाद और उसके आस पास के इलाकों में सैकड़ों भारतीयों को पेड़ पर लटकाकर बिना किसी सुनवाई के फाँसी दे दी। ऐसा माना जाता हैं कि इलाहाबाद के आस पास शायद ही ऐसा कोई वृक्ष बचा हो जिसकी शाखाओं पर लटकाकर निर्दोष लोगों को फाँसी पर न लटकाया गया हो। हर एक हिंदुस्तानी जो अंग्रेजों की ओर से नहीं लड़ रहा था, औरतों और बच्चों का हत्यारा माना गया।
सर जेम्स आउट्रम के अनुसार यह मुस्लिम षडयंत्र था, जिसमें हिन्दू शिकायतों का लाभ उठाया गया। इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि भले ही 1857 के विद्रोह में हिन्दू मुस्लिम एकसाथ मिलकर लड़ाई लड़े परंतु न तो इसमें मुस्लिम पक्ष द्वारा षडयंत्र रचा गया और न ही हिन्दुओं की शिकायतों का लाभ उठाया गया।
अंग्रेजी साम्राज्य से उस समय जो भी शिकायतें थी वो सभी भारतीयों को समान रूप से थी। कोई भी भारतीय किसी भी रूप में निरंकुश और अत्याचारी अंग्रेजी साम्राज्य को स्वीकार करना पसंद नहीं करता था और इसी बात को आधार बनाकर विद्रोह आरंभ हुआ। इसलिए इस विद्रोह को मुस्लिम षडयंत्र कहलाना कहां तक उचित होगा। अगर ठीक से देखा जाए तो वास्तव में षडयंत्र तो अंग्रेजी साम्राज्य भारतीयों के साथ कर रहा था और इसी षडयंत्र के आधार पर अंग्रेजी कंपनी ने भारत पर अपना राजनैतिक नियंत्रण स्थापित कर लिया।
बेंजामिन डिजरेली, इंग्लैण्ड में समकालीन रुढ़िवादी दल के प्रमुख नेता, के अनुसार यह विद्रोह एक आकस्मिक प्रेरणा नहीं थी, अपितु एक उचित संयोग का परिणाम था और वह एक सुनियोजित और सुसंगठित प्रयत्नों का परिणाम था जो अवसर की प्रतीक्षा में थे। साम्राज्य का उत्थान और पतन चर्बी वाले कारतूसों से नहीं होते, ऐसे विद्रोह उचित और पर्याप्त कारणों के एकत्रित होने से होते है।
शायद बेंजामिन डिजरेली परिस्थितियों को ठीक अर्थ में समझने में सफल हुए हैं इसीलिए उन्होंने विद्रोह को राष्ट्रीय विद्रोह के संदर्भ में देखकर बात की।
उल्लेखनीय हैं कि 1957 में भारतीयों ने विद्रोह की शताब्दी को काफी धूमधाम के साथ मनाया था जिससे स्पष्ट होता हैं कि विद्रोह का स्वरूप राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम था। विद्रोह के राष्ट्रीय स्वरूप के संदर्भ में अगर भारत के दो विशिष्ट आधुनिक इतिहासकारों आर सी मजूमदार एवं डाक्टर एस एन सेन के मतों का अध्ययन किया जाए तो दोनों विद्वानों के मतों में मतभेद है। परंतु दोनों विद्वान इस बात से सहमति व्यक्त करते हैं कि 1857 का विद्रोह सुनियोजित योजना के तहत गठित नहीं किया गया था और न ही इस विद्रोह में किसी एक कुशल और योग्य व्यक्ति ने नेतृत्व किया था।
अक्सर यह माना जाता है कि कमल और चपातियों का घर घर भेजना 1857 के विद्रोह की योजना में शामिल था, परन्तु इस संदर्भ में कोई ठोस प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं हो पाए हैं इसीलिए यह केवल एक जनश्रुति के रूप में ही स्वीकार किए जाने योग्य है।
बहादुर शाह पर चलाए गए मुकदमें में यह साबित करने का प्रयास किया गया कि इस विद्रोह में पूर्व सुनियोजित षडयंत्र में उसका हाथ था पर जो साक्ष्य पेश किए गए उनसे इस आरोप को मजबूती नहीं मिलती है।
असल में जब विद्रोही मेरठ से दिल्ली पहुंचे तब उनके अचानक दिल्ली पहुंचने पर बहादुर शाह को घोर आश्चर्य हुआ। इससे स्पष्ट है कि बहादुर शाह की विद्रोही सैनिकों के साथ मिलकर कोई षडयंत्र नहीं रचा गया।
आर सी मजूमदार के अनुसार सैनिकों के व्यवहार एवं आचरण में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे हम यह विश्वास करें अथवा स्वीकार कर लें कि वे अपने देश प्रेम से प्रेरित हुए थे अथवा यह कि वे अंग्रेजों के विरुद्ध इसीलिए लड़ रहे थे कि देश को स्वतंत्र करा सकें ।
आर सी मजूमदार अपने मत के आखिर में इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि 1857 का तथाकथित विद्रोह न तो प्रथम, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था। इसके अलावा मजूमदार का यह कथन बड़ा महत्वपूर्ण हैं कि इस विद्रोह के उत्तरकालिक प्रभाव के कारण देश में एक राष्ट्रीय चेतना और गौरव की भावना का जन्म हुआ। यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं हैं कि उन दिनों में भारत में राष्ट्रीयता की भावना नाममात्र के लिए थी।
इतिहासकार मजूमदार के इस कथन को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि विद्रोह के केंद्रीय नेताओं के बारे में जो जानकारी प्राप्त होती हैं उससे स्पष्ट होता हैं कि इन सभी ने अंग्रेजों के साथ अंतिम घड़ी तक आपसी समझौते के लिए बातचीत जारी रखी और जब देखा कि विद्रोह के अलावा अन्य कोई मार्ग शेष नहीं है तब विद्रोह का झंडा बुलंद किया। इन नेताओं में अधिकतर आपसी संघर्ष में उलझे रहते थे और लगातार एक दूसरे के विरुद्ध षडयंत्र रचा करते थे।
डॉ एस एन सेन के अनुसार- सैनिक विद्रोह अनिवार्य था। कोई भी विजित राष्ट्र सदा के लिए विदेशी दासता में नहीं रह सकता। एक तानाशाही शक्ति को अन्त में तलवार की शक्ति से ही राज करना पड़ता है, चाहे वह उसे मखमल की म्यान में ही रखे। भारत में यह तलवार सिपाहियों की सेना के संरक्षण में थी। सिपाहियों और उनके विदेशियों के बीच जाति, भाषा अथवा धर्म का कोई बन्धन नहीं था। सैनिक विद्रोह 1857 में तो अनिवार्य था परन्तु यह साम्राज्य के संविधान में अन्तर्भूत था।
डाक्टर सेन इस मत को स्पष्ट रूप में स्वीकार करते हैं कि सैनिक विप्लव विद्रोह के रूप में आरंभ हुआ और इसने उस समय राजनैतिक स्वरूप धारण कर लिया जब विद्रोहियों ने अपने आपको दिल्ली के राजा के अधीन होने की घोषणा कर दी और जमींदारों और असैनिक जनता ने अपने आपको सम्राट की अधीनता में स्वीकार कर लिया।
इस प्रकार डाक्टर सेन इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि 1857 का विद्रोह एक स्वतंत्रता संग्राम था । 1857 के विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण बात यह हैं कि इस विद्रोह में हिन्दू और मुस्लिमों ने एकसाथ अंग्रेजी सेना से, आपसी भाईचारे की मिसाल कायम करते हुए, लोहा लिया था। बहादुर शाह, जो कि एक मुस्लिम सम्राट था, को सम्राट स्वीकार करना अपने आप में विद्रोह की एकता की एक अलग तस्वीर उभरकर सामने आती है।
हिन्दू मुस्लिम एकता को स्वीकार करते हुए एक वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारी एचिंसन लिखते हैं कि इस मामले में हम मुसलमानों को हिन्दुओं से नहीं लड़ा सकते। यहां से स्पष्ट होता हैं कि हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच सांप्रदायिकता का बीज अंग्रेजों द्वारा अपने साम्राज्यवाद को बचाए रखने के लिए बोया गया।
1857 के विद्रोह के प्रमुख केंद्र दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, बरेली, झांसी तथा आरा थे। बहादुर शाह का अकुशल नेतृत्व और कमजोर व्यक्तित्व विद्रोह के प्रमुख केंद्र में राजनीतिक दुर्बलता के रूप में सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आई। ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होल्कर, हैदराबाद के निज़ाम, जोधपुर के राजा तथा दूसरे राजपूत शासक, भोपाल के नवाब, पटियाला, नाभा और जींद के सिख शासक तथा पंजाब के दूसरे सिख सरदार, कश्मीर के महाराजा, नेपाल के राणा तथा दूसरे अनेक सरदारों और जमींदारों ने विद्रोह को कुचलने में अंग्रेजों की सहायता की क्योंकि यह वर्ग अपने भविष्य के लिए अंग्रेजी शासन को ही बेहतर समझता था, इसीलिए अपनी सभी सुख सुविधाओं और सामंती अधिकारों की रक्षा करने के लिए इन्होंने विद्रोहियों की तुलना में अंग्रेजों का साथ देना कहीं अधिक उचित समझा।
मद्रास, बंबई, बंगाल तथा पश्चिमी पंजाब में जनता की विद्रोहियों से पूरी सहानुभूति थी परंतु यह प्रदेश विद्रोह से अछूते ही रहे।
आरंभ में विद्रोह में शामिल अवध के बहुत से जमींदारों, अंग्रेजों से यह आश्वासन प्राप्त करने के पश्चात् कि उनकी जागीरें उन्हें वापस लौटा दी जाएगी, तत्पश्चात विद्रोह से स्वयं को अलग कर लिया। अर्थात जिस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए विद्रोह में शामिल हुए वह बिना लड़े ही मिल गया।
इस आधार पर जवाहर लाल नेहरू का यह कथन महत्वपूर्ण साबित होता हैं कि खासतौर से यह एक सामंतवादी विद्रोह था, जिसके अगुआ सामंतवादी सरदार या उनके साथी थे और जिसमें विदेशी विरोधी व्यापक भावनाओं से सहायता मिली। गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने विद्रोह को कुचलने के पश्चात अपने इन सहायकों के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा कि इन शासकों तथा सरदारों ने तूफ़ान के आगे बांध की तरह काम किया, वर्ना यह तूफ़ान एक ही लहर में हमें बहा ले जाता।
इससे स्पष्ट होता हैं कि अगर पूरा भारत राष्ट्रीय एकता का परिचय देता हुआ विद्रोह में शामिल हो जाता तब परिणाम अलग ही देखने को प्राप्त होता।
मद्रास, बंबई, बंगाल तथा पश्चिमी पंजाब में जनता विद्रोहियों से पूरी सहानुभूति थी परंतु फिर भी ये क्षेत्र विद्रोह से अप्रभावित ही रहे।
अंग्रेजी की साम्राज्यवादी नीतियों के शिकार हुए जमींदारों को छोड़कर उच्च तथा मध्यम वर्गों के लोगों ने विद्रोहियों का समर्थन नहीं किया क्योंकि इनका मानना था कि अंग्रेजों के अधीन ही भारत उन्नति पथ पर अग्रसर हो सकता है और विद्रोहियों को यह वर्ग राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने वाले वर्ग के रूप में देखता था।
वहीं आधुनिक शिक्षा प्राप्त वर्ग ने भी विद्रोहियों का साथ नहीं दिया। पश्चिमी विद्वान विशेष रूप से केम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड तथा लंदन विश्वविद्यालयों के विद्वान इस विद्रोह को केवल 1857 का सैनिक विद्रोह के रूप में स्वीकार करते चले आ रहे हैं जो कि यह उनका विद्रोह के प्रति पूर्वाग्रह मात्र है।
यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि 1857 का विद्रोह न तो पूरी तरह सैनिक विद्रोह है और न ही स्वतंत्रता संग्राम बल्कि यह सैनिक विद्रोह से थोड़ा ज्यादा और स्वतंत्रता संग्राम से कुछ कम है।

-मोहित कुमार उपाध्याय

संदर्भ:-
आधुनिक भारत का इतिहास: बी एल ग्रोवर
भारत का स्वतंत्रता संघर्ष: बिपिन चंद्र
आधुनिक भारत का इतिहास: बिपिन चंद्र
डिस्कवरी ऑफ इंडिया: जवाहर लाल नेहरू
भारत का स्वातंत्र्य समर: विनायक दामोदर सावरकर