चुनावी रंग और जुबानी हुड़दंग- स्नेहा किरण

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चुनावों का मौसम शुरू होते ही जो आरोप-प्रत्यारोप की जुबानी जंग शुरू हो जाती है, उसे देखते हुए वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष्य औऱ लोकतंत्र क़े चौथे आधार स्तंभ के विषय में पूर्व प्रधानमंत्री व प्रिय कवि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा लिखित ये पंक्तियाँ आज बिलकुल सटीक बैठती हैं-

कौरव कौन, कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है
दोनों ओर शकुनि का फैला कूटजाल है
धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की लत है,
हर पंचायत में पांचाली अपमानित है
बिना कृष्ण के आज महाभारत होना है,
राजा कोई बने, रंक को तो रोना है

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मखौल बनाकर रख देने वाली आज़ की इस मीडिया का हर चुनाव के पहले रवैया वाक़ई शर्मनाक़ है। यह सही है कि कुछ पत्रकार भ्रष्ट हैं। पेड न्यूज में कथित खबरों की कीमत वसूलने वाले मीडिया की काफी बदनामी भी हुई है। यह भी सच्चाई है कि मीडिया का कोई हिस्सा खुद नेताओं का है या कुछ नेताओं को ऊंचा उठाने और कुछ को गिराने का काम करता है। सरकार अगर चाहती है कि हर भारतीय का इस संघीय ढांचे व संविधान में आस्था बनी रहे तो उसके लिए उसे इस संपूर्ण मीडिया-तंत्र को गंभीरता से लेना ही होगा और कई ऐसे कड़े कदम उठाने होंगे ताकि भविष्य में कोई किसी क़े व्यक्तिगत मामलों में सार्वजनिक तौर पर आऱोप लगाने से पहले हजार बार सोंचे। सोशल-नेटवर्किंग साइट्स पर किसी की भावनाओ को आहात करना सही नहीं है; पर भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में इस तरह की तानाशाही हरगिज बर्दाश्त नहीं की जाएगी जो हमारी मानसिक-नपुंसकता का परिचायक है। हमारी सबसे बड़ी समस्या है की हम मुद्दों पर बात करने का साहस ही नहीं रखते और अपने विरोधियों को साम-दाम-दंड-भेद का सहारा लेकर दबाने में ही ख़ुद को विजेता समझने की भारी भूल करते है, क्योंकि वाक़ई हम सब कहीं-न-कहीं मानसिक तौर पर नपुंसक ही है, बस हमारी ज़ात अलग-अलग़ है, वरना अब तक इसका कोई न कोई तोड़ निकल ही आता है।

‘जय हिंद’
-स्नेहा किरण
(पीपुल्स पॉवर प्रवक्ता, बिहार)