मन के दर्पण में- स्नेहलता नीर

65

हुआ प्रफुल्लित रोम-रोम है, अबकी सावन में।
प्रियतम का आनन दिखता है, मन के दर्पण में।

प्यार भरी वो मीठी बतियाँ याद बहुत आतीं।
छुवन भरा अहसास करा कर,व्याकुल कर जातीं।
आलिंगन की प्रबल प्रतीक्षा, मचली चितवन में।
प्रियतम का आनन दिखता है, मन के दर्पण में।

दमक रही माथे की बिंदिया, कंगन भी खनकें।
महक रही हाथों की मेहंदी, झाँझर भी झनकें।
प्रणय निवेदन करे प्रेयसी, चढ़ते यौवन में।
प्रियतम का आनन दिखता है, मन के दर्पण में।

काले-काले उमड़-घुमड़ घन, मुझे डराते हैं।
रिमझिम-रिमझिम जल बरसा कर, आग लगाते हैं।
हवन कुंड में जले विरहिणी, पावस-पावन में।
प्रियतम का आनन दिखता है, मन के दर्पण में।

किया प्रेम में सब कुछ अर्पित, मैंने साजन को।
ढूँढ रही हूँ विह्वल होकर, अब मनभावन को।
चाहूँ पावन प्रीति तुम्हारी, हृदय समर्पण में।
प्रियतम का आनन दिखता है, मन के दर्पण में।

मन करता है पंख लगाकर, तुम तक आ जाऊँ।
निज बाहों का हार सजन जी, तुमको पहनाऊँ।
अति बेबस मैं यहाँ और तुम, बैठे लंदन में।
प्रियतम का आनन दिखता है, मन के दर्पण में।

-स्नेहलता नीर