हरितालिका व्रत- तपस्या का छंद: डॉ सुनीता मिश्रा

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आज हरितालिका तीज है। इसे एक बार आरंभ करते हैं और यह जीवन भर का संकल्प बन जाता है। हरितालिका का संकल्प शिव जी के प्रति माँ पार्वती के प्रेम और निष्ठा से प्रारंभ होता है। जहां पति रुप मे शिव जी को पाने की आराधना है।

हरितालिका शब्द के दो शब्दों मे ही इस व्रत का अर्थ समाहित है। हरित+तालिका, हरित यानि हरण करना और तालिका यानि सखियां अर्थात पार्वती की सखियां उन्हें पिता के घर से हरण कर वन में ले गई और वहीं उन्होंने निर्जला रहकर शिव जी को पाने का संकल्प किया। तभी से इस चराचर जगत मे इस व्रत की महिमा फैली और आज भी इस व्रत को निर्जला रहने के संकल्प के साथ पतिदेव की लंबी उम्र की कामना के साथ मनाया जाता है।

मेरे मत से यह हरितालिका व्रत तपस्या का छंद है, जिसमें संस्कृति की कविता गूंथी हुई है और जिसका ध्येय है संबंधों का संचयन। राग भरे संबधों को पाने का चरम सुख, वो मधुरम फल की प्राप्ति, वो संवेदना का असीम फल, इस सुख को एक सुहागन व्रती स्त्री, एक पत्नी, एक जीवनसाथी ही महसूस कर सकती है।

साधना, संस्कार को आंचल मे समेटकर सौभाग्य के समग्र प्रतीकों को समेटना, यथा लाल चूडिय़ां, मेहंदी, सिंदूर, महावर, काजल, बिंदी, बिछुआ, पायल और लाल साडी व चुनरी के साथ श्रृंगार, एक अमोघ अविरल प्रेम के साथ सिर्फ एक ही साध “देही सौभाग्यं आरोग्यं सच में मन को अद्भुत सुख से आपूरित कर देता है और जीवनसाथी के व्यक्तित्व को सुगंधित।

जिस संस्कृति मे विवाह को सात जन्मों का साथ माना जाता है और उसी साथ को हर व्रत और त्योहार मे सुहागिनें देवों से फलित होने का वरदान मांगती हैं ..और यही जीवन का आजीवन संकल्प बन जाता है।

तो आईये अपने निर्जला व्रत को एक मधुरम् छंद बनाएं और गुनगुनाएं अपने जीवनसाथी के साथ।

डॉ सुनीता मिश्रा

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