भूख- प्रीति चतुर्वेदी

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भूख की तड़प हर किसी को है
पर महसूस अंदरूनी किसी-किसी को है
किसी को कुछ पाने की भूख है
किसी को खाने की भूख है
किसी को नाम कमाने की भूख है
किसी को किसी का नाम डुबाने की भूख है
भूख सबमें है, हर जगह है
पर सबकी तरह-तरह है

देखा जब तड़पते हुए भूख से बच्चे
जो होते है मन से कितने ही सच्चे
तब लगा सच में क्या है,
हम इसी समाज के बंदे
जो थे कपड़ों से बहुत ही गंदे
क्योंकि उनके हालात ही थे इतने मंदे
भूख की तड़प हर किसी को है
पर महसूस अंदरुनी किसी-किसी को है

गलती नहीं थी, उनका गरीब होना
गलती हमारी थी, उनको गरीब रहने देना
गलती नहीं थी,
उनका खुद पर ध्यान न दे पाना
गलती हमारी थी,
उनकी तरफ हमारा ध्यान ही न जाना
बस यही था हमारा सपना,
उनका शोषण कर खुद आगे बढ़ना
भूख की तड़प हर किसी को है
पर महसूस अंदुरूनी किसी-किसी को है

मिलती नहीं जिन्हें खाने को रोटी,
कटती है रात उनके लिए अनोखी
दुख बड़ा है उनका जैसे पर्वत की चोटी
लगती होगी जिन्हें यह बात बड़ी छोटी

पूछिए जाकर उनसे,
जिन्हें इसके लिए सुननी पड़ती है,
सबकी खरी खोटी
अहमियत पता है उन्हें,
जिन्हें नसीब नहीं एक वक्त की रोटी
भूख की तड़प हर किसी को है
पर महसूस अंदुरूनी किसी-किसी को हैं

कितना होता है, हमसे अनाज व्यर्थ
फेंक कर खाना कूड़ेदान में हम,
करते है, अनजाने में कितना अनर्थ
जो नहीं है, खाना जुटा पाने में समर्थ
वहीं समझता हैं भूख का अर्थ
नहीं करना चाहिए हमें अन्न का अपमान
करना चाहिए हमें, उन्हें अन्न का दान
जिन्हें हैं इसके प्रति सम्मान
भूख की तड़प हर किसी को है
पर महसूस अंदुरूनी किसी-किसी को हैं

-प्रीति चतुर्वेदी