इक हुनर ज़िंदगी- बलजीत सिंह

120

साथ तेरे हो कैसे बसर ज़िंदगी
संग मैं हूँ तू शीशे का घर ज़िंदगी

अहमियत जानते हैं जो इसकी बहुत
सिर्फ़ उनके लिए इक हुनर ज़िंदगी

तेरे क़दमों पे गिर भीख ये माँगती
तू लगाता अगर दांव पर ज़िंदगी

मैं तो वादे पे अपने हूँ क़ायम मगर
तू न वादे से अपने मुकर ज़िंदगी

-बलजीत सिंह बेनाम