खुद से खुद की बातें: लॉकडाउन से अनलॉक तक का सफर- डॉ सुनीता मिश्रा

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आज पूरा देश वैश्विक महामारी से जूझ रहा है। हर तरफ कोरोना खिलखिला रहा है और जीवन देहरी पर असहाय खड़ा है। तीन महीने से उपर का समय हो गया है। लॉकडाउन से लेकर अनलॉक तक का यह सफर, निश्चित ही सभी के लिए नये अनुभव, नयी सोच, नयी मर्यादा और रिश्तों को फिर से संजोने-संवारने का समय रहा। एक स्त्री, एक कामकाजी महिला, एक गृहिणी प्लस होम मेकर और ऑफिस मेकर होने के कारण एक स्त्री की जिम्मेदारी दोहरी रही और यह कहूं कि तिहरी भी तो आश्चर्य नहीं होगा, क्योंकि लॉकडाउन की अवधि में घरेलू कार्य करने वाले हेल्पर्स की भी कमी रही। ऐसे में लॉकडाउन की अवधि सच मे मेरे लिए अद्भुत और अद्वितीय अनुभव रहा और अकल्पनीय भी।
सृष्टि की सृजनकर्ता, घर को पूर्णता प्रदान करने वाली स्त्री, परिवार और घर की आधार स्तंभ, ममत्व और स्नेह की प्रतिमूर्ति नारी ने चेहरे पर बिना किसी शिकन के घर और बाहर की जिम्मेदारी निभाई वह किसी से छिपा नहीं है। कभी वह माँ के रुप में बाहर रहने वालों बच्चों को ढाँढस बंधाती हुई कहती है कि मैं और पापा यहां ठीक हैं बेटा, तुम अपना ख्याल रखना। हमारी बिल्कुल चिंता मत करना, घर से बाहर मत निकलना। मैं तुम्हें खिचड़ी बनाना सीखाती हूं बन जाएगी। बड़ा आसान है, बहुत जल्दी ही हम मिलेंगे। अभी इस लडाई को साथ मिलकर लड़ना है और हराना है।
कभी वह अन्नपूर्णा बन पति की हौसला बढ़ाती रही, तुमको तो निकलने के बहाने चाहिए, सब्जी नहीं भी आए तब भी घर में इतनी चीजें हैं कि हम आराम से रह सकते हैं। चुपचाप घर में रहो और इन पलों को भरपूर जियो।
कभी वह पुरखिन दाई बनकर अपने ही मम्मी पापा को समझाती नजर आई कि घर में ही रहो। कुछ न मिले तो हम हैं न, इस बार मैं अचार बनाकर तुम्हें खिलाऊंगी। बस आप आराम करो, दवाइयों की जरूरत है मुझे बताना मैं ऑर्डर कर दूंगी।
कभी कामवाली बाई को समझाती रही, मैं घर का काम कर लूंगी, तुम पैसे ले जाना और कोई जरूरत हो तो बताना। मैं जब बोलूं तभी आना।
कभी मैनेजर के रुप में कार्यरत कर्मचारियों को ढ़ाढस बंधाया। सब काम हो जाएगा, घर से ही काम करो, मैं हमेशा आप सबके साथ हूं।
कभी डॉक्टर, नर्स, पुलिस कर्मी, मीडिया कर्मी के रुप में बाहर जाते समय घर वालों को जीने का मकसद और ड्यूटी की जिम्मेदारी समझाती रही। और क्या बताऊं साहब एक छोटी बच्ची ने अपने पिता से कहा, अब मैं गुड़िया खरीदने की जिद्द नहीं करुंगी, बस पापा आप घर में रहो।
ये सब किस्से या कहानियां नहीं, हर नारी ने जो इन चंद दिनों में जिया है, वही अनुभूत बातें हैं।घर हो या दफ्तर, राजनीति हो या रणनीति हर जगह नारी ने मैनेज किया है वो बेहतर मैनेजर भी होती हैं। मुझे लगता है सृजनकर्ता के कारण उनमें यह गुण आ जाता है कि मकान को घर कैसे बनाना है। लॉकडाउन की इस अवधि में जहां घर का काम लगभग बढा हुआ था वहीं सूरज की पहली किरण से उठना और अपने ममत्व से घर परिवार की देखभाल के साथ प्रकृति, जीवजंतु सभी में प्राणों का संचार करना तभी तो हम आरुषि कहलाती हैं। (सहसा मुझे अपने ऊपर भी घमंड हो आया)। सुबह से चलती यह दिनचर्या रात को सबको काढ़ा पिलाने तक का यह सफर बहुत ही अलग है। न कोई पहचान की चिंता, न ही प्रतिष्ठा का भय, न ही कोई अहं, इन दिनों तो आईने ने भी हमें पहचानना बंद कर दिया है, आईना मुझसे मेरे होने की निशानी मांगे पर हम भी मस्त हैं हमनें भी कह दिया, मन लागो मेरो यार फकीरी में। आईने के साथ पतिदेव ने भी दबी जुबान से कह ही दिया कुछ बालों में कलर वगैरह कर लो, ब्यूटी पार्लर न सही तुम तो सीखी हो पार्लर का कोर्स, वही अप्लाई कर लो, मैने भी कह दिया, सादगी में श्रृंगार है पतिदेव चुप।
अभी तो घर के काम के एवज में मैने महीने का पगार लेना भी शुरू कर दिया है और नहीं तो क्या तीन महीने से उपर हो गए हैं झाडू पोंछा बरतन मांजते, पर ये पति भी कम होशियार नहीं होते, हो सकता है ये संगति का भी असर हो, इस महीने पैसा देने में आंखें खूल गई और कहा यार मैं भी तो तीन महीने से घर का आधा काम कर रहा हूं न, मुझे पैसा कौन देगा। पगार का आधा हिस्सा तो मेरा भी बनता है।
खैर, जनाब हंसते मुस्कुराते इसी तरह यह सफर चल रहा है, पर इस सफर मे थकान का कहीं नामोनिशान नहीं है, एक उम्मीद की किरण है जो हर दिन कानों में आकर धीरे से कहती है, कल कुछ अच्छा होगा।

-डॉ सुनीता मिश्रा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़