ऐ औरत तुम्हारी अजब है कहानी- रुचि शाही

ऐ औरत तुम्हारी अजब है कहानी

तू नन्ही कली थी बाबुल के घर खेले
आंगन मे सजे थे खुशीयों के मेले
तू बनके यौवन की डाली मस्ती मे झुले
तेरी माँग भर गई शुरू सौ झमेले
विदा होके आ गई बाबुल के घर से
छोड़ के अपने बचपन की सारी निशानी

ऐ औरत तुम्हारी अजब है कहानी

उस बेगाने घर को तूने अपना बनाया
मुहब्बत के तिनके-तिनके से सबकुछ सजाया
कोई तूझको पूछे या फिर न पूछे
तूने तो दिल से हर रिश्ता निभाया
फिर भी तेरे हिस्से आँसू ही आये
तू अश्को के समन्दर की है रवानी

ऐ औरत तुम्हारी अजब है कहानी

तूने सबको खिला के खुद को परोसा
तू भूखी भी सोई किसी ने सोचा
तेरी छोटी सी कमी मिले है सौ ताने
मुहब्बत के बदले भी पाया है धोखा
तू अपनो के खातिर तिल-तिल मरी है
नही कोई तेरा तू सबकी बेगानी

ऐ औरत तुम्हारी अजब है कहानी

सबके लिए बदलती रही तू
नए साचों मे ढलती रही तू
वक्त की आग मे जलती रही तू
बस मोम बन के पिघलती रही तू
बदला जमाना मगर कुछ न बदला
अभी भी दाव पर है तेरी जिन्दगानी

ऐ औरत तुम्हारी अजब है कहानी

-रुचि शाही