खिज़ां के दौर में भी- आरबी सोहल

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घिनौने जुल्म पर कब तक, शराफ़त का असर होए
यकीनन इस पे शिद्दत से, बगावत का असर होए

खिज़ां के दौर में भी फ़ूल गर खिलते हैं गुलशन में
यह माली की वफ़ा करती, हिफाज़त का असर होए

न पाए प्यार की मंज़िल, यह इकतरफा कभी उल्फ़त
भला कब तक सहज कोमल, मोहब्ब्त का असर होए

हुनर उसका सिखाएगा, यह पत्थरों को पिघल जाना,
ये शिल्पी के हुनर अंदर, महारत का असर होए

वो हर इक ख़्वाब मर जाता है रातों को जन्म लेकर
सुबह जब ख्याल पर सुलझी हकीकत का असर होए

खुदी का जो करें तांडव सियासत के पहन घुंघरू
क्या उनपे अमर हुईं शहादत का असर होए

अगर बंजर जमीं पर भी मिले हंसता हुआ गुलशन
यह मौला की करम करती इबादत का असर होए

-आर.बी. सोहल