खूनी स्याही से लिखा खूनी दरवाजा- पल्लवी सिंह

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झिलमिलाई रंगीन दिल्ली का वो तमिस्त्र कोना
सुना जिसने रक्तरंजित महलों का बदनसीब रोना
रहीम खान खाने के पूतों के लहू से सनी तोप
निशब्द हो बयां करती है जहाँगीर नाम के विरोध का प्रकोप।
दुखद इतिहास में डूबी है तोरण की दर
है यहीं सल्तनत की लालच में
था कटवाया भाई दारा शिकोह का सर
भय में थम गई है मीनार की सांसे
है देखी इसने अंधेरे में झलकी
बहादुर शाह के बेटों की नग्न लाशें
और न जाने कितनी खूनी यादें है यहाँ समाई
था कहीं शासन लोभ तो कहीं रिश्तों में खाई
दर्द समेट लाल दरवाज़ा एक धरोहर कहलाई।

-पल्लवी सिंह