ज़िंदंगी जैसे कि- सूरज राय सूरज

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ख़्वाहिशें, टूटे गिलासों-सी निशानी हो गई।
ज़िंदंगी जैसे कि, बेवा की जवानी हो गई।।

कुछ नया देता तुझे ए मौत, मैं पर क्या करूँ
ज़िंदगी की शक्ल भी, बरसों पुरानी हो गई।।

मैं अभी कर्ज़-ए-खिलौनों से उबर पाया नहीं
लोग कहते हैं, तेरी गुड़िया सयानी हो गई।।

आओ हम मिलकर, इसे खाली करें और फिर भरें
सोच जेहनो में नए मटके का पानी हो गई।।

दुश्मनी हर दिल में जैसे कि किसी बच्चे की ज़िद
दोस्ती दादा के चश्मे की कमानी हो गई।।

मई के सूरज की तरह, हर रास्तों की फ़ितरतें
मंज़िलें बचपन की परियों की कहानी हो गई।।

-सूरज राय सूरज