बलवती कामना अंतर की, बंशीधर मैं तुमको पाऊँ
तुम मुरली मधुर बजाओ जब, तब स्वर लहरी मैं बन जाऊँ

मैं राह निहार रही कबसे, अँखियाँ कान्हा पथराईं हैं
व्याकुल बेबस हूँ आदिदेव, मन की कलियाँ मुरझाईं हैं
ये बीत न जाये उमर कहीं, मैं सोच-सोच कर घबराऊँ
तुम मुरली मधुर बजाओ जब, तब स्वर लहरी मैं बन जाऊँ

आहट जब सुनती मैं कोई, लगता है हरि तुम आये हो
प्रियतम निर्गुण अंतर्मन में, बस तुम ही तुम्हीं समाए हो
आकर बैठो सम्मुख मेरे, मैं निरख-निरख कर हरषाऊँ
तुम मुरली मधुर बजाओ जब, तब स्वर लहरी मैं बन जाऊँ

घनश्याम प्रीति पावन मेरी, पल-छिन नित बढ़ती रहती है
सुन लोगे विनती एक दिवस, उम्मीद हृदय में पलती है
सर्वेश्वर शीघ्र पधारेंगें, सब सखियों को मैं बतलाऊँ
तुम मुरली मधुर बजाओ जब, तब स्वर लहरी मैं बन जाऊँ

रिश्ते-नाते जग के छोड़े, मधुसूदन हुई तुम्हारी हूँ
दुनिया के बोल लगें पत्थर, फिर भी अब तक ना हारी हूँ
मैं तुम्हें गहूँ, सोना- चाँदी, मोती-माणिक सब ठुकराऊँ
तुम मुरली मधुर बजाओ जब, तब स्वर लहरी मैं बन जाऊँ

मन की इच्छा पूरन कर दो, फूलों-सी मैं खिल जाऊँगी
वो घड़ी बता दो गोविंदा, जिस घड़ी तुम्हें मैं पाऊँगी
हर चीज जगत की है नश्वर, तुम अविनाशी तुमको ध्याऊँ
तुम मुरली मधुर बजाओ जब, तब स्वर लहरी मैं बन जाऊँ

चुन-चुन कर सुमन श्यामसुंदर, प्रतिदिन मैं हार बनाती हूँ
कंजनलोचन कोमल-कोमल, कलियों की सेज बिछाती हूँ
रँग गयी श्याम रँग ज्ञानेश्वर, रँग देख साँवरे कर इतराऊँ
तुम मुरली मधुर बजाओ जब, तब स्वर लहरी मैं बन जाऊँ

मैं टेर लगाती निशि-वासर, गिरिधर अब तो तुम आ जाओ
मैं जनम-जनम की प्यासी हूँ, तुम प्रेम-सुधा-रस बरसाओ
तुम हाथ थाम लो हे केशव, मैं गीत मिलन के फिर गाऊँ
तुम मुरली मधुर बजाओ जब, तब स्वर लहरी मैं बन जाऊँ

हे पद्मनाभ, अक्षरा, मदन, वैकुंठनाथ करती वंदन
रख कर निज वरदहस्त सिर पर, तन-मन कर दो पावन चंदन
हे विश्वमूर्ति खुश हो झूमूँ नाचूँ, गाऊँ मैं इठलाऊँ

-स्नेहलता नीर