दो मुक्तक- पीएस भारती

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आस्था अस्तित्व का आधार है
बिना इसके साधना बेकार है
मानिए तो पत्थरों में ईश है
सृष्टि का हर देवता साकार है।

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श्रंखलाएं टूटती हैं टूटने दो
आस्थाएं रूठती हैं रूठने दो
हम बने इंसान यदि इसके लिए
प्रार्थनाएँ छूटती हैं छूटने दो

– पीएस भारती