निगाहों की खता- आरबी सोहल

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निगाहों की खता समझूं या दिल की इल्तिज़ा समझूं
जो पत्थर दिल को पिघलाए उसे अदभुत अदा समझूं

बुरे हालात के चलते अगर उल्फत क़त्ल होए
इसे मैं हादसा मानूं मगर ना बेवफ़ा समझूं

उन्होंने देख कर मुझको तो आंखों में भरे आंसू
ख़ुशी में झूमते जज्बे दिलों उसकी दुआ समझूं

उम्मीदों के चिरागों से अगर दिल हो गया को रौशन
उन्हीं की याद के सूरज का दिल को आसरा समझूं

कि जब दुश्वारियां होती सब्र के हाल पे कायल
सब्र का परबतों से भी मैं ऊंचा हौसला समझूं

वो मुजरे का हरिक घुंघरू जो कोठे पर खनक जाए
बड़ा बेबस कोई नगमा फिज़ा में गूंजता समझूं

-आर.बी. सोहल