बच्चों के लिए भात- चन्द्र विजय प्रसाद चन्दन

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बेहया
बेगैरत भी है
किन्तु/उत्तक
माँसल है
गदराया-सा
तभी तो
नर्म और गुदाज़
बिस्तर पर
गुदगुदे एहसास पाकर
खिल उठती है वह

हालाँकि
मात्र घण्टे भर में ही
उबन सी हो जाती है मुझे
और/आँचर के कोर
सहेजने से पहले ही
हटा देता हूँ
अपनी दृष्टि से सामने से

क्रमवार
रात के अंधियारे में
दबे पाँव
उसका आना
और/गिड़गिड़ाना
द्रवित कर जाता है मुझे
क्योंकि/जानता हूँ-
तीन-तीन बच्चों के
क्रंदन में लिपटे
भूखे स्वर
अपशकुनी भयावहता
परोसता है
उसके जीवन में
इसलिए याचना भरी
उसके अनुग्रह को
टाल नहीं सकता

जानते हुए भी कि-
डायन सी ही है वह
जिसने/निगल लिया है
मरदूद बच्चों का पिता
भले ही महुआ में डूबा
उसका जीवन क्षयग्रस्त था
बावजूद/दिहाड़ी कर
कमा लाता ही था
बच्चों के लिए भात

-चन्द्र विजय प्रसाद चन्दन,
देवघर, झारखण्ड