मुश्किलों के दौर में- आरबी सोहल

142

आज चेहरों पे खुशी के गुल खिलाता कौन है
मुश्किलों के दौर में अब मुस्कुराता कौन है

देखते हैं वे अंधेरा हर तरफ़ फैला हुआ
हौसले के साथ पर दीपक जलाता कौन है

आदमी टुकड़ों में करता है बसर यह ज़िंदगी
लाज़मी तरतीब में इसको लगाता कौन है

औरतों के हक़ की बातें संसदों में हो रही
बाहर हक़ उनके ज़माने में बचाता कौन है

मैं तो चाहूं हर ज़ुल्म की अब ख़त्म कर दूं नस्ल
देखते हैं इस जतन में साथ आता कौन है

मुजरिमों ते मुलजिमों में वे फ़र्क करते नहीं
यूं कानूनी रहबरों को रहा दिखाता कौन है

जिस क़दर वे मांगते हर पल वफ़ाओं की दुआ
इस क़दर तहज़ीब से उल्फ़त निभाता कौन है

-आरबी सोहल