वो कसक वो खलिश- मञ्जूषा

346

कई रोज़ से कोई ग़म नहीं
आँचल का कोर भी नम नहीं
वो कसक वो खलिश रही नहीं
वो आह में भी अब दम नहीं

तुझे भूलने की जो थीं कोशिशें
मुझे रास आ गयीं जाने-मन
अब ख्वाब में कहीं तुम नहीं
वो सिसकते हुए भी हम नहीं

चलो फिर से जीने की चाह हो
नई सुबह हो नई शाम हो
तेरे शहर को अब सलाम है
चलें अब उधर को कदम नहीं

वो जो मोम मुझमे था पिघल गया
जो दरिया उछला था जम गया
अब कोई रंज है न ख़ुलूस है
कई रोज़ से कोई ग़म नहीं

-मञ्जूषा