सघन दुख के मरुस्थल में- रकमिश सुल्तानपुरी

141

सघन दुख के मरुस्थल में रचा सुखधाम देता है
दुखी उर को सृजन से वह बड़ा आराम देता है

स्वयं के भाव, रस अनुभूतियों को शब्द दे करके
वही कवि है जो कविता को सफ़ल आयाम देता है

लगाकर यार गोता अनुभवों के क्षीरसागर में
पिरोकर भाव निज उर का सफल पैग़ाम देता है

लुटाकर फूल सा खुशबू मिटा बैठा ख़ुदी को जो
निछावर आत्मा करके नया अभिराम देता है

किसी मुनि सा लगाता ध्यान उर की कन्दराओं में
झलक भर दिव्य दर्शन का उचित परिणाम देता है

अलौकिक कल्पना से वो बनाता लौह को पारस
छिपी अभिव्यंजनाओं को नया इक नाम देता ह

कहीं वो चुन रहा होता नियति की रम्य घटनाएं
जहाँ को नित नए भावों का इक इनआम देता है

-रकमिश सुल्तानपुरी
भदैयाँ, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश