सृजन की बातें- पीएस भारती

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अब सृजन की बातें बीती हो गईं
वीथिकाएं सुधि की तंद्रिल सो गईं

वय की व्याधि थी कि काया भी हुई कृष
और अर्जित जो किया था बह गया यश
व्यंग्य की विष बेल अब करती विवश
सखे! सुख की कामना विस्मृत हुई

समय का परिवर्तन बड़ा गतिशील है
कल जहां स्निग्धता अब सांकलों की भीड़ है
बन्धनों की बाढ़ की ही ढील है
भावना कृशकाय, तन तिरस्कृत हुईं
वीथिकाएं सुधि की तंद्रिल सो गईं
अब सृजन की बातें बीती हो गई

-पीएस भारती