हिम्मत मत यूँ हार पथिक- स्नेहलता नीर

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हिम्मत मत यूँ हार पथिक क्यों
बेबस है मजबूर है।
चलता चल तू देख सामने,
लक्ष्य अभी कुछ दूर है।

पथ के कंटक फूल बनेंगे,
टूटेंगे अवरोध सभी।
मन में अगर ठान लेगा तो,
सफल रहेंगे शोध सभी।

कर अहसास शक्तियाँ सारी,
तुझमें हैं तू शूर है।
हिम्मत मत यूँ हार पथिक क्यों,
बेबस है मजबूर है।

नहीं हीन यूँ समझ स्वयं को,
नहीं हार को लगा गले।
आशाओं के दीप जला रख,
चलें आँधियाँ विकट भले।

तुझमें अंश स्वयं ईश्वर का,
उसका तुझमें नूर है।
हिम्मत मत यूँ हार पथिक क्यों,
बेबस है मजबूर है।

कर्महीन को फल कब मिलता,
कर्मशील सुख सब पाता।
सतत कर्म की महिमा का
गुण, गान विश्व सारा गाता।

मान और सम्मान कर्म को,
देता जग भरपूर है।
हिम्मत मत यूँ हार पथिक क्यों,
बेबस है मजबूर है।

हाथों की सौभाग्य लकीरें,
निर्मित करनी स्वयं तुझे।
प्यास सफलता को पाने की,
ध्यान रहे अब नहीं बुझे।

बदलेगा ये बुरा समय भी,
बना हुआ जो क्रूर है।
हिम्मत मत यूँ हार पथिक क्यों,
बेबस है मजबूर है।

-स्नेहलता नीर