आंच- राहुल प्रसाद

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उसने शादी के पलकॊं पर,
हज़ारों ख़्वाब सजा रखे थे !

असंख्य भावी खुशियाँ
दूसरों को खुश करने में निकल गईं ।
वो प्यार पाने की चाहत ,
काम – काज के सौदे के साथ मिल गए ।

कुछ ख़्वाहिशें . . .
तवा पर रोटियों की जगह सेंक दिए !
बाकि बचे अरमान . . .
टिफिन में बँद कर
रोज़ पति को भेजते गई ।

सोफा – चादर- रसोई – बरतन ,
जाने कितने नए दोस्त उसके
सबसे अजीज़ होते गए !

फोन पे पापा को
अपनी ख़ुशी का भरोसा दिलाना
आसान हो गया !

दिल की सारी उम्मीदें सिमट कर,
शाम के पति के इंतज़ार पे आ के टिक गईं !

फ़िर भी एक डर सा हमेशा दिल में . . .
“कोई आँच न आए रिश्ते पे”
इसी सोच में गुम कई दफ़ा . . .
चूल्हे की आँच पर
उँगलीयाँ जला ली है उसने

– राहुल प्रसाद