स्पर्श हिन्दी का: ज्योति अग्निहोत्री

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हिन्दी स्वतन्त्र उतनी ही,
जितने कि हम-तुम हैं।
शुभकामनाएं हर सहृदय को,
जो मातृभाषा प्रेम सिंचित हैं।

हिन्दी सहज सरल स्नेहिल ऐसी,
ज्यों माँ का आँचल है।
पाकर स्पर्श हिन्दी का,
मिला सब भावों को सम्बल है।

मुदित नयन जब से खोले,
तुममें ही पाया हृदय दर्पण है।
मन की भावभूमि को हिन्दी ने ही,
दिया स्वछन्द आकाश विचरण है।

ज्योति अग्निहोत्री ‘नित्या’
इटावा, उत्तर प्रदेश