17 सितम्बर: हैदराबाद मुक्ति की स्मृति का दिवस

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देश के विभाजन के दौरान हैदराबाद रियासत उन तीन शाही घरानों में से एक था जिन्हें पूरी आजादी दी गई थी। ये थे- कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद।

लेकिन सन् 1948 में इनके समक्ष दो ही विकल्प बचे थे- या तो वे भारत में शामिल हो जायँ या पाकिस्तान में। हैदराबाद रियासत का विस्तार 82698 वर्गमील तक था, जिसमें वर्तमान के तेलंगाना, मराठवाड़ा, उत्तरी कर्नाटक तथा विदर्भ के कुछ भाग शामिल थे। लगभग 80 प्रतिशत हिन्दू आबादी वाले इस राज्य का शासन मुस्लिम निजाम राजवंश के हाथ में था। देश के विभाजन के बाद इस रियासत ने, जिसके तत्कालीन निजाम थे उस्मान अली खान, भारत या पाकिस्तान में मिलने के बजाय एक आजाद देश के रूप में रहने का निर्णय लिया।

हैदराबाद रियासत पर सन् 1724 से निजामों का शासन था जो सितम्बर 1948 तक चला और ‘हैदराबाद मुक्ति संग्राम’ की सफल परिणति के रूप में 17 सितम्बर 1948 को हैदराबाद ‘निजामशाही’ से मुक्त होकर ‘भारत गणराज्य’ में सम्मिलित हो गया।

विडम्बना देखिए 15 अगस्त 1947 को जब देश ब्रिटिश शासन से मुक्त होकर आजादी का जश्न मना रहा था, हैदराबाद के लोग अत्याचारी निजाम शासन से मुक्त होने को छटपटा रहे थे। पीड़ित जनता द्वारा हैदराबाद को भारत में मिलाए जाने की मांग पर निजाम शासन द्वारा उन पर बेतहाशा जुल्म ढाए जा रहे थे।

भारत के आजाद होने पर जहाँ भारत सरकार यह मानकर चल रही थी कि हिन्दू बहुल आबादी वाले हैदराबाद के निजाम स्वयं भारत संघ में मिलने की घोषणा कर देंगे, तत्कालीन निजाम (अंतिम) उस्मान अली खान हैदराबाद को एक अलग देश के रूप में बनाए रखने की मंशा के साथ अपनी सेना तथा अपने द्वारा पोषित एमआईएम (मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लमीन) के लीडर कासिम राज़वी के नेतृत्व में गठित रजाकारों की सेना द्वारा स्थानीय जनता पर जुल्म ढाते हुए उनकी मांग का क्रूरता से दमन कर रहे थे।

रजाकारी सेना द्वारा किए गए मीरपुर नौखालिया नरसंहार में पाँच हजार से ज्यादा हिन्दू मार दिए गए थे। निजाम द्वारा कासिम राज़वी के नेतृत्व में गठित रजाकारी सेना में दो लाख रजाकार नियुक्त थे, जिनका एकमात्र काम हिन्दुओं का दमन रह गया था। आनुपातिक रूप से मुस्लिम आबादी को बढ़ाना तथा हिन्दुओं की आबादी को घटाना उनका एकमात्र मकसद था और अपने इस मंसूबे को कामयाब करने के मद्देनजर हिन्दुओं का कत्ले-आम तथा हिन्दू महिलाओं का सामूहिक बलात्कार उनके द्वारा शुरू कर दिया गया था।

भारत की आजादी के बाद देश के बीच में स्थित इस इलाके से गुजरने वाली ट्रेनों को बहुधा रजाकारों के अत्याचार का शिकार होना पड़ता था। हैदराबाद के निजाम किसी भी सूरत में अपनी रियासत को भारत गणराज्य का हिस्सा बनाना नहीं चाहते थे। इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि एक बार इस संदर्भ में उन्होंने मुस्लिम लीग के संस्थापक तथा पाकिस्तान के निर्माता मुहम्मद अली जिन्ना से पूछा था कि क्या वे भारत के खिलाफ लड़ाई में हैदराबाद का साथ देंगे?

जिस पर जिन्ना का जवाब मिला था कि मुट्ठी भर आभिजात्य वर्ग के लोगों के लिए वे पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरे में नहीं डाल सकते। किन्तु इसके बावजूद पाकिस्तान से म्यांमार के रास्ते मिल रही हथियारों व पैसों की मदद तथा अपने एजेण्ट मीर नवाज जंग की बदौलत आस्ट्रेलिया से मिल रही हथियारों की सप्लाई के बल पर निजाम हैदराबाद को एक आजाद देश के रूप में बनाए रखने का सपना पाले रहे।

निजाम द्वारा हैदराबाद रियासत का स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने की कवायद तथा स्थानीय जनता द्वारा भारत संघ में मिलाए जाने की मांग से उत्पन्न अशांति के माहौल का शान्तिपूर्ण समाधान निकालने की लाॅर्ड माउण्टबेटन की सलाह को प्रधानमन्त्री नेहरू जी गम्भीरता से लेने के पक्ष में थे, जबकि गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की दृष्टि में यह भारत के पेट में ऐसा कैंसर था जो बर्दाश्त के काबिल नहीं था। रजाकारों द्वारा स्थानीय जनता पर ढाए जा रहे जुल्म से आम जनमानस तो त्रस्त और खिन्न था ही, 22 मई 1947 को गंगापुर रेलवे स्टेशन पर हिन्दू यात्रियों पर हुए हमले ने पूरे भारत की जनता को निजामशाही के विरुद्ध ला खड़ा किया।

स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए सरदार पटेल ने जनरल करियप्पा को तत्काल कश्मीर से दिल्ली तलब कर पूछा कि अगर हैदराबाद के मसले पर पाकिस्तान की तरफ से कोई सैन्य प्रतिक्रिया होती है, तो क्या वह बिना किसी अतिरिक्त सहायता के स्थिति को सँभाल सकते हैं?

जवाब में करियप्पा द्वारा ‘हाँ’ कहे जाने पर सरदार पटेल ने तत्काल निर्णय ले लिया कि उन्हें क्या करना है और इस प्रकार पृष्ठभूमि तैयार हो गई हैदराबाद पर सैन्य कार्रवाई की, जिसे नाम दिया गया “ऑपरेशन पोलो”। दुनिया में सबसे ज्यादा पोलो मैदान (संख्या 17) वाला शहर था हैदराबाद, इसी को ध्यान में रखते हुए सैन्य कार्रवाई का नाम रखा गया ‘ऑपरेशन पोलो’।

भारत के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल राॅबर्ट बूचर को आशंका थी कि पाकिस्तान की सेना उक्त कार्रवाई की प्रतिक्रियास्वरूप अहमदाबाद या बम्बई पर बम गिरा सकती है, जिसके कारण वे इस फैसले के खिलाफ थे, किन्तु दृढ़ इच्छाशक्ति के धनी सरदार पटेल ने जो निर्णय ले लिया था तो ले लिया था।

भारत सरकार द्वारा सैन्य कार्रवाई किए जाने की भनक लगने पर निजाम ने गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी से ऐसा न करने का अनुरोध किया, जिस पर राजगोपालाचारी और नेहरू जी ने परस्पर मंत्रणा कर सैन्य कार्रवाई रोकने का फैसला किया। तद्क्रम में निजाम के अनुरोध पत्र का जवाब देने के लिए रक्षा सचिव एच एम पटेल तथा वी पी मेनन की बैठक बुलाई गई।

अभी निजाम को जवाब देने का मसौदा तैयार हुआ ही था कि सरदार पटेल ने यह घोषणा कर चौंका दिया कि भारतीय सेना हैदराबाद में घुस चुकी है और इसे रोकने के लिए अब कुछ नहीं किया जा सकता। और इस प्रकार 13 सितम्बर 1948 को शुरू हुआ “ऑपरेशन पोलो” 17 सितम्बर 1948 को अपने लक्ष्य में सफलता की प्राप्ति के साथ पूर्ण हुआ जब निजाम ने आत्मसमर्पण करते हुए भारत संघ में सम्मिलित होने की घोषणा की। पाँच दिन तक चली इस कार्रवाई में आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 1373 रजाकार तथा हैदराबाद स्टेट के 807 जवान मारे गए। भारतीय सेना ने भी अपने 66 जवान खोए जबकि 97 घायल हुए।

इस प्रकार भारत की स्वतंत्रता के ‘एक साल एक महीना दो दिन’ के बाद हैदराबाद की जनता के मन की चिर प्रतीक्षित अभिलाषा पूर्ण हुई और उन्हें आजादी का सुखद अहसास प्राप्त हो सका। यदि सरदार पटेल ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय नहीं दिया होता तो भारत का नक्शा वह नहीं होता जो आज हमारे सामने है।

संजय कुमार राव