महिला सुरक्षा और सामाजिक दायित्व: सुजाता प्रसाद

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अगर हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो हम पाते हैं कि आज़ हमारे बच्चे जरूरत से ज्यादा उग्र स्वभाव के हो गए हैं और बहुत असहिष्णु भी। साझा संस्कृति को संजोने वाले हमारे समाज में पहले बच्चे संयुक्त परिवार में रहते थे, एक दूसरे से नोंक झोंक हो जाने पर भी तुरंत सुलह कर लिया करते थे। पर आज सहनशीलता जैसे आचरण से हमारे अधिकांश बच्चे कोसों दूर हैं। पहले टीचर की डांट से उन्हें कुछ बुरा नहीं लगता था। आजकल तो माता पिता डांटते हैं या टोकते हैं तो भी उन्हें बुरा लगता है।

बच्चों को हमें यह समझाना चाहिए कि आपको बुरा नहीं लगना चाहिए, क्योंकि ये वो लोग हैं जो आपकी चिंता करते हैं, आपके शुभचिंतक होते हैं। आपके टीचर्स, आपके पेरेंट्स आपको संभालने वाले होते हैं। इनकी बात मानेंगे तो आप गलतियां करने से बच जाएंगे और अच्छाई बुराई में फर्क करना भी समझ पाएंगे। हमें बच्चों का मन समृद्ध करने की जरूरत है, समय-समय पर नैतिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए उन्हें नैतिक शिक्षा देने की जरूरत है। उन्हें परिवार और समाज के प्रति संवेदनशील बनाने की जरूरत है।

देश को एक अच्छे और संपूर्ण नागरिक सौंपने की जरूरत है। और इतना तो हम सब जानते हैं कि समस्याएं हैं तो समाधान भी है। किसी पर दोष थोपना अत्यंत सरल होता है। ऐसा हम तब बोलते हैं, ऐसा हम तब करते हैं जब हममें कुछ कमियां होती हैं या किसी चीज की जानकारी अधूरी होती है। इसलिए सरकार और इसके सिस्टम को कोसने से पहले हमें अपने आप में भी आमूलचूल परिवर्तन लाने की जरूरत है, जो सामाजिक जागरूकता के बगैर संभव नहीं है। यही बात महिला सुरक्षा पर भी लागू होती है।

सचमुच यह बहुत बड़ी विडंबना है कि शिक्षित होकर अपने जीवन में नई नई ऊँचाइयों को पा रही नारी आज भी अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है। दिनों दिन विकसित होते भारत में जहां महिलाएं अपने आप को साबित कर चुकी हैं, वहीं “महिला सुरक्षा” एक बड़ी समस्या बन चुका है।

नारी सुरक्षा के कानून और कायदे होते हुए भी उस पर अत्याचार होते रहते हैं। ऐसे हालात में सवाल यह उठता है फिर कायदा होने का क्या फायदा और कानून होने पर भी ऐसी स्थिति क्यों? बेशक, भारत में महिला सुरक्षा से जुड़े कानून की लिस्ट भी मौजूद है हमारे पास – चाइल्ड मैरिज एक्ट 1929, स्पेशल मैरिज एक्ट 1954, हिन्दू मैरिज एक्ट 1955, हिंदू विडो रीमैरिज एक्ट 1856, इंडियन पीनल कोड 1860, मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1861, फॉरेन मैरिज एक्ट 1969, इंडियन डाइवोर्स एक्ट 1969, क्रिस्चियन मैरिज एक्ट 1872, मैरिड वीमेन प्रॉपर्टी एक्ट 1874, मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन एक्ट 1986, नेशनल कमीशन फॉर वुमन एक्ट 1990, सेक्सुअल हर्रास्मेंट ऑफ़ वुमन एट वर्किंग प्लेस एक्ट 2013 आदि। इसके अलावा 7 मई 2015 को लोक सभा ने और 22 दिसम्बर 2015 को राज्य सभा ने जुवेनाइल जस्टिस बिल में भी बदलाव किया है। इसके अन्तर्गत यदि कोई 16 से 18 साल का किशोर जघन्य अपराध में लिप्त पाया जाता है तो उसे भी कठोर सज़ा देने का प्रावधान है।

परंतु, अगर विचार करें तो पिछले कुछ वर्षो में महिला सुरक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। गौर करें तो ऐसा होने का कारण समाज में लगातार अपराधों में हो रही बढ़ोतरी है, समाज में हो रहा नैतिकता का पतन है, कुंठित मानसिकता का बोलबाला है।

भारत में महिलाओं के प्रति अपराध की सूचि देखी जाये तो यह बहुत लंबी है। जिसमें भ्रूण हत्या, यौन हिंसा, यौन शोषण, दहेज़ हत्या, घरेलू हिंसा, बलात्कार, मानसिक उत्पीड़न, तेज़ाब फेंकने जैसी निर्ममता,, वैश्यावृति जैसे पेशे में जबरन संलिप्त करना, अपहरण, ऑनर किलिंग, महिलाओं का कार्यक्षेत्र में बाह्य शोषण, सामाजिक प्रताड़ना और कई अन्य अत्याचार शामिल है। बालिकाएं, युवतियां, महिलाएं इन सब वजहों को लेकर असुरक्षित महसूस करती रहती हैं।

वैश्विक पटल पर भी महिलाओं की कमोबेश स्थिति ऐसी ही है। कहना ग़लत नहीं होगा कि ये तमाम घटनाएं समाज के माथे पर कलंक का टीका बन कर अवलंबित हो रही हैं और ज्वलंत समस्याओं के रूप में अपने पांव जमा कर हमारे सामने उपस्थित हैं।

आंकड़ों के अनुसार मध्यकालीन युग से लेकर 21वीं सदी के इस दौर तक सृष्टि का सृजन करने वाली महिलाओं की प्रतिष्ठा में लगातार ह्रास होता देखा जा रहा है। हालांकि पारिवारिक स्तर पर, सामाजिक स्तर पर प्रतिशतता में ऐसा होना नगण्य पाया गया है। लेकिन यही पारिवारिकता और सामाजिकता का भाव जहां खत्म हो जाता है वहीं से अधिकांश अपनी इस जिम्मेदारी, अपने इस दायित्व से छुटकारा पा लेना चाहते हैं, और अराजक स्थिति का बोलबाला हो जाता है।

हमारी संस्कृति में नारी की बड़ी महत्ता रही है। ऐसे में इस संस्कृति में अगर महिला असुरक्षित महसूस करती है और महिला सुरक्षा पर सवाल उठते हैं तो यह चिंतनीय है। आज के आधुनिक समाज में जब नारी अपने आप को पुरुष के समकक्ष स्थापित कर चुकी हैं। जहां हमारा समाज तेज़ी से उन्नत हो रहा है वहीं इस दौर में नारी का सुरक्षित रह पाना मुश्किल बन गया है।

बेटियां आज घर से बाहर निकलने से डर रही है। जीवन के हर क्षेत्र में अपने परचम लहरा चुकी नारी आज किसी भी क्षेत्र में अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही है। ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिसका उत्तर देश की प्रत्येक महिला मांग रही है।

चाहे निर्भया हो या प्रियंका रेड्डी या इन्हीं के जैसी असंख्य बेटियां जिनके साथ अमानवीय व्यवहार हुआ, जिसे सोच कर ही रूह कांप उठता हो, ऐसे कुकृत्य बार बार दोहराए ना जाएं, इसके लिए गंभीरता से विचार करने की जरूरत है और सख्ती से विशेष नियमावली बनाने की भी। सिर्फ़ कैंडल मार्च किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता है। हां सामूहिक रूप से अपने इरादों को दृढ़ करके समाधान निकालना हमारे लिए बड़ी उपलब्धि हो सकती है।

यह बात सच है कि महिलाएं परंपराओं को सहेजने में अग्रणी भूमिका निभाती हैं लेकिन परंपराओं की संरक्षिका होने के कारण महिलाओं का ही भविष्य अंधकारमय होने लग जाए तो उन परंपराओं को सामाजिक स्तर पर परिवर्तित करने के लिए कदम आगे बढ़ना चाहिए, समाज को जागरूक होना चाहिए।

संसार में विकास के लिए महिलाओं का मुख्य धारा से जुड़ा होना बहुत जरूरी है, क्योंकि समाज में नारी की स्थिति जितनी सम्मानजनक, महत्वपूर्ण, सुदृढ़ और सक्रिय होगी उतना ही समाज मजबूत, उन्नत व समृद्ध होगा। मेरे विचार से मुख्य धारा में जुड़ने का मतलब सिर्फ़ आर्थिक संपन्नता ही नहीं होना चाहिए बल्कि इसके लिए पूरी तैयारी भी होनी चाहिए। जैसे आत्मसुरक्षा के गुर में निपुण होना, अपने इर्द-गिर्द सुरक्षा कवच का निर्माण करना, सतर्कता का साथ होना, बुद्धिशील और प्रज्ञावान होना।

ठीक वैसे ही जैसे अग्नि से बचने के लिए हम जो एहतियात बरतते हैं, बिजली के नकारात्मक प्रभाव से जैसे खुद का बचाव करते हैं आदि आदि। क्योंकि बचाव की इसी सतर्कता के कारण ही तो हम आग और बिजली के गुण से वंचित नहीं रह पाते हैं। अपने विवेक को जागृत रखकर हम बुराइयों और गलतियों के दलदल में कभी नहीं फंसते हैं।

चाहे हम जिस भी समाज के हिस्से हों, जिस भी पारिवारिक पृष्ठभूमि से हम आते हों, हमें अपने क़दम बढ़ाने के साथ साथ सचेत रहने के ये कुछ उपयुक्त आदत भी अपना लेना चाहिए। महिलाओं से आह्वान है कि अगर खुद को ताकतवर बनाना है, इस देश को ताकतवर बनाना है तो आपलोग शिक्षा पर विशेष ध्यान दीजिए, बेटियों को न सिर्फ पढ़ाइए बल्कि सुशिक्षित कीजिए।

आज़ की नौजवान पीढ़ी से यही अपेक्षा है कि आपको कोशिश करनी चाहिए कि आप एक मजबूत नारी बनें। सबल तो हम हैं ही,बस आपको खुद को यकीन दिलाने की जरूरत है, एक विश्वास जगाने की जरूरत है। Actually “Feminism isn’t about making women stronger. Women are already strong.”

अब जब स्थिति की गंभीरता ये बयान कर रही है कि कड़े कानूनों के बनाने के बावजूद भी महिला अपराध में कमी होने के बजाय उसमें दिन प्रतिदिन लगातार बढ़ता ग्राफ देखने को मिल रहा है।

समाज में महिलाओं की सुरक्षा गिरती जा रही है। महिलाएं अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रही हैं। ऐसे में महिलाओं के लिए विकृत होते माहौल को बदलने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं अपितु हर आम नागरिक की है ताकि हर महिला गर्व से अपने जीवन को जी सके और हमारा समाज सही मायने में उन्नति कर सके।

जैसा कि हम जानते हैं कि भारत सरकार महिला सुरक्षा को लेकर सतर्क है, और उसके लिए कड़े नियम और कानून भी बनाए गए हैं। परंतु जब तक कोई सकारात्मक सामाजिक क्रांति नही होगी, और बालिकाएं, युवतियां, महिलाएं अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने में अपनी हिस्सेदारी नहीं दिखाएंगी तब तक किसी परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

कानून बनते रहेंगे और उनका उल्लंघन ऐसे ही होता रहेगा। जरूरत है महिलाओं को जागरूक होने की। वे अपनी सुरक्षा खुद ही कर सकें हमें ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए। नारी को भी अपनी सुरक्षा को लेकर खुद ही तैयार होना पड़ेगा। क्योंकि हमारे समाज में बदलाव तो आया पर इस परिवर्तन की सम्यक तैयारी नहीं की गई। ना पारिवारिक स्तर पर न ही सामाजिक स्तर पर।

बस हम बदल गए, और आधुनिकता की चकाचौंध में खो गए। परिवर्तन को स्वीकारने के साथ साथ हमें भी परिवर्तित होना पड़ता है। हमें इसका भी तो ध्यान रखना पड़ेगा ना कि हमारी आंतरिक बनावट क्या है और हमारी बाह्य बुनावट क्या है? उसकी जानकारी तो होनी ही चाहिए। अपनी सीमा के अंदर और बाहर का फ़र्क तो नज़र आना चाहिए। अब इस सुझाव पर कई आक्षेप लगेंगे यह कहते हुए कि यह पिछड़ेपन की निशानी है, दकियानूसी सोच है।

लेकिन हमें ऐसा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि अगर ऐसा होता तो बरमूडा ट्राएंगल और उसकी सीमा से हम खौफ क्यों खाते। सरल और सीधे शब्दों में कहें तो सचेत और सतर्क रहना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। शुरुआत समाज की छोटी इकाई परिवार से करते हैं, जहां हर माता-पिता के द्वारा अपनी संतान को दी जाने वाली परवरिश वैज्ञानिक और स्तरीय होना चाहिए।

ना सिर्फ बेटी को सीख मिलना चाहिए बल्कि बेटों को भी सीखाना चाहिए। तब हमें बिना कानून को हाथ में लिए कानून का साथ मिल सकता है। हम मानें या न मानें लेकिन यह सच है कि ग्रास रूट लेवल पर पनपी स्तरहीनता बहुत सारी विकट स्थितियों की जन्मदात्री होती है, जिसका भुगतान हमें भुगतना ही होता है।

सुजाता प्रसाद
शिक्षिका, नई दिल्ली