अवसाद के घेरे में आप या आपकी मुट्ठी में अवसाद: सुजाता प्रसाद

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हम यह भूल जाते हैं कि विषम परिस्थितियों में हमारी कमज़ोरी भी बड़ी ताकत बन जाती है। हमें इस अवसर का फायदा उठाते हुए कुछ अच्छा कर गुजरना चाहिए, बजाय अवसाद के दौर के गुजरने के। यही वो वक़्त होता है जब हम अपनी पूरी ऊर्जा से अपने किसी भी संभावित लक्ष्य को पूरा कर सकते हैं। अगर हमारे अंदर यह कला विकसित हो गई तो जिंदगी में आए उलट फेर से भी हम उबर सकते हैं।

आइए इस हुनर को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। जीवन सिर्फ सही होने में नहीं है, क्योंकि जीवन तो हमारी भागीदारी में ही है। इसलिए हमारी भागीदारी में रुकावट नहीं आनी चाहिए। अपनी दिनचर्या के साथ साथ हमें खुद को किसी न किसी रचनात्मक कार्य में संलग्न रखना चाहिए। हमारी भागीदारी ही तो हमारे जीवन को सुंदर और सुखद बनाती है।

अक्सर किसी के मुस्कुराते चेहरे को देखकर हम यही अंदाजा लगा लेते हैं कि फलां के जीवन में तो दुखों की आवाजाही ही नहीं है। और यही सोचते हैं कि देखो कितना खुशनसीब है वह, काश हमारी भी किस्मत ऐसी होती। और फिर खुद को कोसने का सिलसिला शुरू हो जाता है।

हम क्यों नहीं समझते कि हंसते हुये चेहरों का अर्थ ये नहीं कि इनके जीवन में दुखों की उपस्थिति होती ही नहीं है, बल्कि इनके अन्दर परिस्थितियों को संभालने की क्षमता होती है। वे अपने अंदर विकसित आंतरिक शक्तियों के कारण बुद्धिमत्ता पूर्वक उस दुःख से लड़कर उससे निकल सकने की क्षमता हासिल कर लेते हैं। ऐसी कोशिश हम भी तो कर सकते हैं।

देखा गया है कि हम बहुत दुःख या पीड़ा को झेलते हुए डिप्रेशन या अवसाद का शिकार हो जाया करते हैं। ऐसी स्थितियां या तो मां के असमय गुजर जाने पर या फिर पिता का साथ छूट जाने से आ सकती है, या किसी गंभीर बीमारी से जूझना हो सकता है, कर्ज़ में डूबना हो सकता है। बार बार असफलता का मिलना कारण बन सकता है तो कभी आपकी जिंदगी में आपके द्वारा हुई सबसे बड़ी गलती हो सकती है।

छात्र हैं तो बुलिंग की समस्या हो सकती है या फिर ब्रेकअप। अपनी संतानों से दुखी हुआ मन हो या स्त्रियों में उनका मेनोपॉज़ की पूर्व स्थिति को झेलना हो, सभी अवसाद के कारण बन सकते हैं। कोरोना पेंडेमिक तो इसका कारण बन ही रहा है।

ऐसे में हर समस्या में ही समाधान ढूंढने की कोशिश हमारे आगे बढ़ने में मददगार साबित होगी। अगर हर असफलता को अपनी मिलने वाली सफलता का सुधार कार्य मान लिया जाए और फिर अपनी मंजिल की ओर चल दिया जाए तो अवसाद हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। ऐसे ही अगर अपनी गलती को गुरु मान लिया जाए और स्वयं को शिष्य तो जीवन में नया सवेरा हमारा इंतज़ार कर रहा होता है। टेंशन लेना हमारी समस्या नहीं बनती है, बल्कि टेंशन के हावी हो जाने से डिप्रेशन की समस्या हमारे जीवन में आ सकती है। बहुत अधिक टेंशन लेने, ना लेने के बीच एक बारीक रेखा होती है, जिसे पार करना सिर्फ हमारे हाथ में होता है।

आप कहेंगे कहना कितना आसान होता है और करना कितना मुश्किल। हां बेशक इसी “हां ना” पर तो हमारा बनना टिका है और बिखरना भी। अगर हम स्वयं को इस रेखा के उस पार ले जाने में मदद करते हैं तो आप खुद को खो देंगे और अगर इस पार ही खुद को संभाल लेते हैं तो अपार दुखों के बावजूद भी खुद को पा लेंगे। आप ही तय कीजिए खुद को पाना चाहते हैं या खोना। हां यह सच है कि खोना आसान है, पाना थोड़ा मुश्किल। तय आपको करना है, अवसाद के घेरे में आप या आपकी मुट्ठी में अवसाद?

सुजाता प्रसाद
सनराइज एकेडमी
नई दिल्ली