हम हिंदी हैं और हिंदी हमारी शान: मनु शर्मा

226

कहने को तो हम हिंदी भाषी लोग हैं, हमारी मातृ भाषा हिंदी है। कहने को तो हम हिंदी हैं और हमारी आन-बान-शान हिंदी है, किंतु यह कहने मात्र का ही है और कहने और सुनने में ही अच्छा लगता है।

आज हमारे सभ्य और सांस्कृतिक देश और समाज में पश्चिम सभ्यता ने अपना डेरा डाल लिया है और हम अपनी मातृ और अपनी प्राचीन भाषाओं का त्याग कर पश्चिम की सभ्यता और संस्कृति को अपना रहे हैं। जहाँ हम एक और वेदों, उपनिषदों, पुराणों, काव्यों में वर्णित भाषा व संस्कृति से दूर हो रहे हैं तो वहीं पाश्चात्य संस्कृति अपनाने वाले देश भी हमारे वेदों, पुराणों को और हमारी मातृ भाषा हिंदी का अपने दैनिक जीवन मे उपयोग कर रहे हैं। हम अपनी उसी संस्कृति और सभ्यता को बेकार और नकारा बताते है और हम उस अर्द्धनंगी सभ्यता को अपनी आजादी बता रहे है।

हमारे अंदर उसी दिन की एक शाम को मन में विचार आता है कि यार कल तो हिंदी दिवस है,  तो हम तुरंत कुछ सोचते है और उसी दिन शाम को अपने व्हाट्सएप और फेसबुक पर एक सुंदर सी फ़ोटो लगा देते है, जिसमें बड़े से शब्दों में लिखा होता है कि हम हिंदी है और हिंदी हमारी शान है।

उसे देखकर ऐसा लगता है मानो की हमसे बड़ा देशभक्त तो पूरी दुनिया में ही नहीं है, ठीक उसी समय आपका बच्चा आता है तो वह हिंदी भाषा में कुछ कहता है तो उसे आप तुरंत चुप करा कर इंग्लिश भाषा में बोलने के लिए कह देते हो। वह इंग्लिश बोलने लगता है और हम भी अगले दिन शाम आते-आते हिंदी दिवस की शुभकामनाओं वाले फोटो को हटा लेते हैं और फिर उस विचार पर अगले 364 दिनों के लिए उस पर ताला डाल देते है।

कहने को तो हम हिंदी भाषी है, किंतु आज हमारे अंदर उसी पश्चात संस्कृति ने घर कर लिया है, जो हम उसके अधीन हो गए है। आज हमारे देश मे ही अपनी मातृ भाषा बोलने वाले को ही नगण्य समझा जाता है और उसी पश्चात संस्कृति की भाषा बोलने वाले को विद्धवान समझ लिया जाता है।

जिस कारण भी हमारी मातृ भाषा हास्य का पर्याय बनती नजर आती है। आज हमारे देश का युवा अपनी ही संस्कृति से विमुख हो रहा है। वह पाश्चात्य संस्कृति को ही अपनी जीवन रेखा समझ रहा है,वजबकि भारत की संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति दोनों में ही बड़ा अंतर है, जो हमारी संस्कृति है वह वेद, पुराणों से वर्णित है और पाश्चात्य संस्कृति वाले स्वयं ही वेदों अर्थात भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षित हो रहे है।

आज के दौर में बढ़ते अंग्रेजी के प्रभाव और उपयोगिता को देखते हुए हिंदी के प्रति लोगों की रुचि कम हुई है, जिस कारण हम यह भी कह सकते है कि देश मे बढ़ती पश्चात भाषा के प्रभाव से भी हिंदी के प्रति लोगों का लगाव कम हुआ है किंतु, एक विशेष दिन यह लगाव भाव-विभोर हो उठता है और हम समस्त हिंदी हो जाते है।

आज यह कहना अनुचित नही है कि हम हिंदी है और हिंदी हमारी शान है, यह आज भी विद्वान और वाकई में हमें आज भी यह कहने हमे गर्व महसूस होता है। लेकिन यह एक चिंता का विषय है कि आज हमारे ही देश में हमारी ही मातृ भाषा का आस्तित्व मात्र एक दिन का रह गया और उस एक दिन के लिए ही नहीं बल्कि कुछ घंटों के लिए रह गया है।

आज हमें हमारी भाषा हिंदी ऐसी प्रतीत होती है, जिसे हमने किसी दूसरे देश से उधार लिया हो और जिसका उपयोग करने मैं चार्ज लगता हो, जहाँ एक और अन्य देश हिंदी भाषा को सम्मान की नजर से देख रहे है, ठीक उसी प्रकार हम अपनी हिंदी भाषा को एक बाजारू भाषा के तौर पर देख रहे है, जो हमे बाजार में सब्जी खरीदते हुए, मिले मुफ्त के धनिए के समान है, जो चाहिए तो सबको है, भले ही घर जा कर कचरे में फेंक दें।

हिंदी एक भाषा नही है, यह एक भारत है, यह किसी भाषा की मोहताज नही है। भले ही आप हिंदी न बोले लेकिन कम से कम सम्मान तो करें।

मनु शर्मा
अशोकनगर