नए समाज के निर्माण के लिए नारी को पहचाननी होगी अपनी शक्ति: डॉ प्रेमपाल सिंह वाल्यान

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21वीं सदी का डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी, मन बार-बार सोचने को विवश हो जाता है कि आखिर नारी-शोषण की इन्तहा क्या है? क्या कभी भ्रूण-हत्या, दहेज-हत्या, तलाक और बलात्कार जैसी समस्याओं के चक्रव्यूह से इस बंदिनी को मुक्ति मिलेगी या नहीं? क्यों उसे देवी और दासी की मर्यादाओं से परे आदर्श मानवी का सम्मान प्राप्त हो सकेगा?

शायद नहीं, सहज ही ये शंकाएँ मन में घर करने लगती हैं। क्योकि महिलाओं की 60 प्रतिशत जनसंख्या आज भी उस मानसिकता की शिकार है जिसकी लिप्सा के हवनकुंड में एक-न-एक नारी प्रतिदिन होम होती रहती है। बेटा से वंश चलता है, वह बुढापे का सहारा होगा।

इन पूर्वाग्रहों से ग्रसित अधिकतर महिलायें भ्रूण-परीक्षण के लिए अल्ट्रासाउंड और अमाईनोसेन्टीसिस जैसी वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लेती हैं। अजन्मे शिशु पर किया गया यह अत्याचार नारी-शोषण का प्रथम सोपान है।

इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि वैदिक-काल के प्रारम्भ में कन्यादान के साथ उपहार देने की प्रथा वात्सल्य के रूप में शुरू हुई थी। लेकिन आज के माता-पिताओं के लिए उपहार देना वात्सल्य का प्रतीक न होकर एक विवशता बन गई है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विवाह वह व्यापार बन गया है जिसमें नकदी, गहने, सामान आदि की खुली माँग की जाने लगी है। आज यह प्रतिष्ठा का सूचक तथा लड़के की योग्यता का प्रमाणपत्र बन चुका है। क्योंकि योग्यता की डंडी पर तौलकर ही दहेज निर्धारित किया जाता है।

वधू-पक्ष द्वारा रूपया ब्याज पर लेकर अपना मकान गिरवी रखकर भी यदि वर-पक्ष की मुँहमाँगी मुरादें पूरी नहीं हो पातीं तब वधू की प्रताड़ना आरम्भ हो जाती है। दहेज के कारण होने वाली मौतों के इतिहास को पलटा जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि परिवार में बहू को जलाने की घटनाओं में सास और ननद की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। बहुत से मामले में तो ससुर का नाम बचाव-पक्ष में आता है और पति को पता भी नहीं होता कि उसकी पत्नी को दहेज के लिए इस हद तक प्रडताड़ित और उत्पीड़ित किया जा रहा है।

प्रेम-विवाह या अन्तर्जातीय-विवाह दहेज-समस्या के समाधान में मील का पत्थर साबित हो सकता है। पर इस प्रकार के विवाह कितनी माताओं के गले उतरते हैं? यद्यपि हर माँ अपने पुत्र के लिए एक जीवनसंगिनी की आस रखती है। किन्तु वही पुत्र जब अपने लिए समान मानसिकता वाली पत्नी का चयन कर लेता है तो वह उसे सहज ही ग्राह्म नही होता। आखिर क्यों? इसके पीछे भी दहेज न पाने की पराजय होती है और झूठी शान के नाम पर कई बार उसे अपमानित किया जाता है।

पुरूष-सत्तात्मक समाज में नारी की त्रासदी तलाक के रूप में भी कम नही है। दूसरी औरत के प्रति पति का बढ़ता आकर्षण इस समस्या के प्रधान कारणों में गिना जा सकता है। इस आकर्षण के कारण न जाने कितने नीड़ के तिनके बिखर रहे हैं। उपेक्षित बच्चे प्रतिहिसा की भावना से ग्रस्त होकर गलत रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। जिससे देश के अपराधियों की सूची में क्रमागत वृद्धि होती रहती है। सच पूछा जाए तो एक नारी की दुश्मन दूसरी नारी ही होती है जो अपने जिस्म की तपिश से दूसरे घर की आबाद जिन्दगी को झुलसा देती है।

विधवा स्त्री को आज भी सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं हो सका है? उसे हतभागिनी कहा जाता है। मुंडन, शादी-ब्याह जैसे प्रत्येक शुभ अवसर पर उसकी छाया तक से परहेज कर उसे उसकी दुरावस्था का बोध कराया जाता है। विधवा को अपमानित जिन्दगी जीने के लिए मजबूर करने में रूढ़िवादी औरतों का ही हाथ होता है। प्रगतिशीलता के इस चारण में कितनी महिलाएँ ऐसी हैं जिन्हांने अपनी नवविवाहिता विधवा बहुओं को अथवा बेटियों के पुनर्विवाह के लिए कदम उठाया हो। सच पूछा जाए तो राजा राममोहनराय और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर – जैसे उदार चरित्र मनीषियों की उपलब्धियाँ आज भी नारी रूपी राहु का ग्रास बनी हुई हैं।

पुरूष के समकक्ष खड़ी होकर बाहर की दुनिया में भागीदारी निभानेवाली आत्मसजग औरत भी नारी-प्रताड़ना से कम त्रस्त नहीं है। परिवार की अन्य महिलाएँ उसकी कार्यव्यसतता के बावजूद उससे उसके परम्परागत कार्यों की अपेक्षा करती हैं। घर लौटने में जरा देर हो  जाए, तो ताने देने में कभी नहीं चूकतीं। पति यदि उसके कार्यों की सराहना करे तो सहज ही उसे ‘जोरू का गुलाम‘ की पदवी प्रदान कर देती हैं।

हिन्दु विवाह अधिनियम-1956 के तहत स्त्रीयों को भी पैतृक-सम्पत्ति में भागीदारी दी गई है। इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी न किसी परिवार ने बेटी को सम्पत्ति में भागीदार बनाया है और न ही किसी बेटी ने इसकी माँग की है। अक्सर मायके से सम्बन्ध बिगड़ जाने के चलते इस अधिकार की माँग नहीं करतीं।

दूसरी तरफ माता-पिता की दलील यह होती है कि उन्होने उस हिस्सेदारी का कर्ज दहेज के रूप में अदा कर दिया है। पर उनकी यह दलील तर्कसंगत नहीं क्योंकि स्नेह के अजस्त्र स्त्रोत ये माता-पिता, जब पुत्री ससुराल से प्रताड़ित होकर मायके की शरण लेना चाहती है, तो आश्रय देने से इंकार कर देते हैं; क्योंकि उनकी धारणा में बेटी अपने ही घर अच्छी लगती है। पर हिन्दुस्तान की बेटियों का अपना घर कहाँ? वह पिता की ड्योढ़ी से निकलकर पति की छत का आसरा लेती हैं और जब पति को उसकी जरूरत नहीं रह जाती तो उसे मृत्यु को गले लगाना पड़ता है।

यदि माता-पिता थोड़ी दूरदर्शिता से काम लें ओर उसकी सम्पत्ति को दहेज का मुलम्मा न चढ़ाकर उसे भी बेटों की तरह सम्पत्ति की स्वामिनी स्वीकार करें तो अवश्य ही उसे अपना घर प्राप्त हो जाएगा। तब न उसे तलाक की विभीषिका दहला सकेगी और न ही उसे दहेज की वेदी पर न्योछावर होने को मजबूर होना पड़ेगा।

नए समाज के निर्माण के लिए प्रत्येक नारी को अपनी शक्ति की पहचान करनी होगी। बेटियों को एक आदर्श नारी बनने का प्रशिक्षण देना होगा उन्हें समुचित शिक्षा प्रदान कर अपने पैरों पर खड़ा करना होगा। उन्हें अपने परिवार में सदहेज होनेवाली तमाम शादियों का विरोध करना होगा और आवश्यकता पड़ने पर उसका बहिष्कार भी करना होगा। ऐसे साँचे में गढ़ी युवतियाँ ही सही मायने में दहेज जैसी अमानुषिक प्रथा का प्रतिकार कर सकेंगी।

भावी नारी यदि सामूहिक रूप से दहेज-लोलुप परिवारों में विवाह करने से इंकार कर दे तो आगे चलकर इस समस्या से निजात पायी जा सकती है। इस दहेज-विरोधी अभियान के प्रथम दौर में कुछ युवतियों के बलिदान से इंकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि उन्हें तरह-तरह से लांछन और आरोप के जरिए प्रताड़ित किया जा सकता है। परन्तु उनका यह बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाएगा।

अब समय आ गया है कि हर नारी स्वार्थ की धारा से ऊपर उठकर, दूसरी नारी की पीड़ा को समझे, ईर्ष्या की भावना से परे हटकर उसकी योग्यता को सम्मानित करें। एक नारी होने के नाते प्रत्येक सास का कर्तव्य है कि बहू की उन्नति को अपनी उन्नति समझकर हर कदम पर उसका सहयोग करें।

अपनी संकीर्णता से उसकी प्रगति का पथ अवरूद्ध न करे। दूसरी ओर बहू भी कर्तव्य-बोध के प्रति सतत जागरूक रहे। दुर्भाग्यवश कोई दुर्घटना किसी के जीवन में घट जाए तो उससे विक्षुब्ध होकर मृत्यु का वरण नही करना चाहिए।

पलायनवादी दृष्टिकोण से समस्या का समाधान कभी नहीं हो सकता। आत्मसम्मान पाने के लिए मन को चटटान की तरह दृढ़ करना होगा। अपराधियों को सजा दिलवाकर नारी-शोषण पर विराम लागाना होगा। इस दिशा में स्वयंसेवी संस्थाएँ तथा नारी-मुक्ति जैसी संस्थाओं को सक्रिय रूप से आगे आना होगा, तभी नारी अस्मिता का तेज दिव्यमान हो सकेगा।

डॉ प्रेमपाल सिंह वाल्यान
यश कोरियर सर्विस,
निकट नवरंग मेडिकल स्टोर,
रेलवे रोड, हापुड़-245101
उत्तर प्रदेश, भारत
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