तो उठ जाओ- स्वामी भगत दीपक

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वह इस खोज से खुश और तनाव-मुक्त था,
मानो, जैसे दुनिया की सभी ख़ुशियाँ उसे मिल गई हो
अब मिला भी क्या?
वही जिसे गले लगाना चाहता था
छूना चाहता था,
और मिल गया, वह हमसफ़र
जो दुखों से दूर
एक नयी दुनिया में लेकर जाना चाहता था
ख़ुशी झलक रही थी उसके मुख पर,
अब उसे पा जो लिया था

कुछ लोग दृश्य को देख कर भावुकता के समुद्र में डूब रहे थे,
मगर कुछ लोग तो भगवान का शुक्रिया अदा कर रहे थे,
मानो जैसे विधाता ने उनकी इच्छा पर तथास्तु बोला दिया हो
कुछ लोग सवाल कर रहे थे, उसे इससे क्या मिला?
कुछ ही पलों में, एक दर्द की लहर सी उठी,
अत्यंत शोकग्रस्त माँ चीखती चिल्लाती हुई दौड़ी
और बेहोश हो गई,
पिता की आंख से एक भी अश्रु नहीं बहा,
बहता भी कैसे? लाश जो बन गया था,
देखता रहा अपने बच्चे को,
बस एक सांस लेती हुई लाश की तरह

अफसोस!
मैंने इस परिवार को मरते हुए देखा,
मौत के सागर में खो गए थे,
क्या मुर्दे भी श्वास लेते है?
जी हां! मैंने देखा इन जीते जागते मुर्दे को श्वास लेते हुए

सूर्य की चमकती रोशनी आज पूरी तरह से अंधेरे में थी,
यह अंधेरा तब से छा गया था,
जब से वह नशे से दोस्ती कर बैठा था
कई वर्षों से,
वह नशे के प्यार में वशीभूत हो कर,
खुद को भूल गया था,
अब घर भी तो न रहा बिक जो गया था,
पत्नी, बच्चों को तो ऐसे मारता था, जैसे कोई रिश्ता ही न हो,
और तो और, पिता को बेरहमी से पीटता जब पैसे नहीं मिलते थे,
और अब तो घर भी उसके लिए महत्वपूर्ण नहीं था
वह इसे क्यों महत्व देगा?
क्योंकि उसने नशे के निवास में शरण जो ले रखी थी,
उसका एक मात्र प्यारा घर;
हर्षित और चिरस्थायी

अब आखिर वह दिन भी आ गया जब उसने,
नशे की लत को धोखा देते हुए देखा था उसने,
उसने सुना कि वह उसे मारने की साज़िश रच रहा था।

अब! अब!
सबसे बुरी स्थिति उसके सामने थी,
उसने चाहा की उसे छोड़ना, मगर
वह खुद को बदल नहीं सका,
असहाय और लाचारी से दबा पाया,
उसका उसका अंतर्मन उसको ताने दे रहा था,
खून का एक-एक कतरा बदला ले रहा था,
अब हवा के रूप में आत्मा का कराहना नकारात्मक सवाल कर रहा था

वह दिन आ चुका था,
कौनसा?
वही, जब उसके कमरे का दरवाज़ा खोला गया,
कुछ लोगों ने उसके बुरे गुणों के बारे में बात की,
पत्नी और बच्चे रोना चाहते थे,
मगर आए भी तो सूखे अश्रु,
उनके सिर से साया तो उठ गया था,
हवा में झूलता हुआ युवा शरीर,
चेहरे पर मुस्कान, होठों पर आखरी संदेश लिए कहता,
बच जाओ इस बुराई से,
मैं तो हार गया, तुम ना हारना

राज़ की बात बताऊं क्या?
मानोगे मेरी बात तुम?
तो आत्महत्या नहीं हत्या है यह,
क्यूंकि हर आत्महत्या के पीछे एक हत्यारा छुपा होता है
हां, जाने से पहले आखिरी बात पूछूं?
जीना है क्या? तो उठ जाओ

-स्वामी भगत दीपक दिलदार
भाई मन्ना सिंह नगर,
माँ वैष्णो देवी दरबार, लुधियाना
संपर्क: 8556046137, 9877384178