विजयध्वज- त्रिवेणी कुशवाहा

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शेर का बच्चा शेर होता है
दहाड़ता है निडर हो के,
विरासत का हौसला है
रखे हरदम साहस भर के

नींव बनी विरासत में हो
कंगूरा बनाना है आसान,
झुकते नहीं वीर सपूतों के पूत
जब तक है तन में जान

आन-बान-शान पर
राष्ट्र के आँच नहीं आने देते हैं,
समरभूमि में दुश्मन के
पल भर चैन न लेने देते हैं

उबाल लहरता रग-रग में
हुँकार भरा फनकारों से,
झुंड में सिर काटते दुश्मनों के
रण पट जाती लाशों के अंबारों से

चंद्रगुप्त, राणा, सुभाष की विरासत
सदा हौसला अफजाई करती है,
हम ऐसे पूर्वजों के वंशज है
जिसकी विजयध्वज सदा लहरती है

-त्रिवेणी कुशवाहा ‘त्रिवेणी’