ज़ख़्म गहरे थे- देवएकता

422

ज़ख़्म गहरे थे तो, सीना आ गया ।
मुझको अब मुश्किल में, जीना आ गया ।।

जब मिली तुमसे तो, घबराहट हुई ।
और माथे पर, पसीना आ गया ।।

सोच कर तुमको, बहुत रोई हूं मैं ।
याद सावन का, महीना आ गया ।।

ये बता दे क़ातिबे, तक़दीर तू ।
मेरी क़िस्मत में, मदीना आ गया ।।

जिंदगी मझधार मे है, “एकता” ।
अब चलाना भी, स़फीना आ गया ।।

-देवएकता