सर्दियों की रुत सुहानी है ग़ज़ल- प्रिया सिन्हा सन्दल

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धड़कने, साँसें, रवानी है ग़ज़ल
दो दिलों को पास लाती है ग़ज़ल

बस दुआओं के उजाले बाँटना
हम फ़क़ीरों की कहानी है ग़ज़ल

जब तलक न दर्द से लबरेज़ हो
राह की बोतल सी खाली है ग़ज़ल

साँस मुर्दा जिस्म को कर दे अता
आग पानी में लगाती है ग़ज़ल

मख़मली सी धूप में खिलती हुई
सर्दियों की रुत सुहानी है ग़ज़ल

है फरिश्तों का तराशा बुत कोई
या कोई अल्हड़ जवानी है ग़ज़ल

धूप से खिलता हुआ कोई कंवल
या के कोई रात रानी है ग़ज़ल

ज़िंदगी क्या चीज़ है दुनिया है क्या
राज़ ये सारे उठाती है ग़ज़ल

सरहदों के पार रक्खे पांव ये
नफरतों को भी मिटाती है ग़ज़ल

तीरगी घुल जाए जब भी ज़ीस्त में
एक सूरज बन के आती है ग़ज़ल

धूप में तपती हुई इक प्यास में
ओस के बूंदों के जैसी है ग़ज़ल

देखतें हैं जब हमें वो नाज़ से
साथ उनके मुस्कुराती है ग़ज़ल

चाक दामन कोई कर जाता है जब
प्यार से टाँके लगाती है ग़ज़ल

आज ये ‘सन्दल’ ज़माना कह रहा
तुझ में शायद मुस्कुराती है ग़ज़ल

-प्रिया सिन्हा ‘सन्दल’