योग: तन, मन, विचार, व्यवहार की अंतर्यात्रा- सुजाता प्रसाद

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भारतीय संस्कृति में हमेशा प्रक्रिया पर जोर दिया गया है। अगर हम प्रक्रिया को ठीक तरीके से करेंगे तो सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। इसलिए हमें प्रक्रिया पर ध्यान देना चाहिए, लक्ष्य पर नहीं। क्योंकि अगर हम प्रक्रिया साध लेते हैं तो लक्ष्य पूरा हो ही जाता है। उदाहरण के लिए किसी भी खेल प्रतियोगिता में कई टीमें खेलने और जीतने की इच्छा से आती हैं। लेकिन जीतती कोई एक टीम ही है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उस दिन अमुक खेल में खिलाड़ियों के खेलने की प्रक्रिया परफेक्ट होती है। कितना सही कहा गया है कि अगर हम प्रक्रिया को सही तरह से नहीं करेंगे तो जीतना सिर्फ एक इच्छा ही रहेगी। हमारे हाथ में बस हमारी कोशिश है। हमारी कोशिश प्रभावशाली होना चाहिए यानी कि वह केंद्रित होना चाहिए, जिसके लिए इसमें सही समय, सही स्थान ये सभी महत्व रखते हैं।
योग संस्कृति भी प्रक्रिया अपनाने की एक बुनियादी प्रक्रिया है। योग निरोग रहने की भूमि तैयार करता है। योग हमारे तन मन, हमारी भावनाओं हमारे विचार सबको सम्यक रूप से संतुलित करता है। हमारे शरीर के बाद योग मानसिक और भावनात्मक स्तरों पर काम करता है। दरअसल योग एक विज्ञान है, जिसे अपने दैनिक जीवन में अपनाने से हमें लाभ पहुंचता है।
योग शब्द संस्कृत के युज शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है जुड़ना। यह जुड़ाव हमें आसन, प्राणायाम, मुद्रा, ध्यान आदि के निरंतर अभ्यास से प्राप्त होता है। योग भारतीय ज्ञान की पांच हजार वर्ष पुरानी शैली है। योग शब्द का का मतलब एक हो जाना भी है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है “योगस्थ कुरू कर्माणि।” अर्थात योग में स्थिर हो जाओ फिर काम करो। 11दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रत्येक वर्ष 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। 21 जून, अब दुनिया के लिये जाना-पहचाना दिन बन गया है, जिसे विश्व योग दिवस के रूप में पूरा विश्व मनाता है।
हालांकि योग में तुरंत इलाज, संभव नहीं है लेकिन रोगों से लड़ने के लिए एक सिद्ध विधि है, जिसे जानकर माना जा सकता है या मानकर जाना जा सकता है। इसलिए शारीरिक और मानसिक लाभ के लिए योग सबसे अधिक ज्ञात लाभों में से एक है। यहां तक कि जब आधुनिक विज्ञान किसी रोग के उपचार में असफल हो जाता है, तब योग अपने शक्तिशाली प्रभाव के कारण उस रोग के विरुद्ध अपना शत प्रतिशत देता है। हम अपनी जागरूकता से योग के इस स्वरुप का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं। कुछ सरल नियमों का पालन करते हुए, हम योग अभ्यास का लाभ जरूर ले पाते हैं।
किसी योग्य गुरु के निर्देशन में योग अभ्यास शुरू करने का संकल्प हमारे जीवन में अच्छे बदलाव का परिचायक बन जाता है। हमें यह ज्ञात है कि सूर्योदय या सूर्यास्त के वक़्त योग का सही समय है। योग खाली पेट करना चाहिए और योग करने से एक-डेढ़ घंटे पहले और बाद कुछ खाना नहीं चाहिए। योग हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से लाभ पहुंचाता है। इसलिए हमें अपनी क्षमतानुसार योग को जरूर अपनाना चाहिए और अपनी शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक सेहत में सुधार लाने की हमारी यह कोशिश होनी चाहिए।
और एक बार जब हम अपने अंदर इस मिठास को अनुभव कर लेते हैं तो उस स्तर पर उस मधुरता को अपना आधार रेखा मान लेना चाहिए। ऐसा इसलिए कि हम हमेशा सजग रह पाएं और यह सोचें कि इससे नीचे नहीं उतरना है, बल्कि उसके ऊपर अगले स्तर पर जाने की तैयारी हमेशा करते रहना है। यही संकल्प हमें योग के प्रभावशाली गुणों से मिलवाता है और हम मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य लाभ उठा पाते हैं। आइए तन, मन, विचार, व्यवहार की इस अंतर्यात्रा में हम भी शामिल हों और स्वस्थ व सुंदर जीवन जीने की इस कला को अपनाएं।

-सुजाता प्रसाद
नई दिल्ली