ज़िन्दगी की बेबाक सच्चाई- अतुल पाठक

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दलदल इंसान को बुरी तरह फँसा देती है, जिससे निकल पाना शायद मुश्किल सा हो जाता है। चाहें ये आम इंसान की ज़िन्दगी की बात हो या फिर फिल्मी सितारों की दुनिया का एक कड़वा सच जिसे शायद नकारा नहीं जा सकता। असल मायने में ज़िन्दगी जैसे हम फिल्मों में देखते हैं उससे बिल्कुल विपरीत होती है। असल ज़िन्दगी का सच जैसे बाहर से हम को दिखाई देता है वास्तव में वैसा बिल्कुल नहीं होता। ज़िन्दगी का सच जिसके साथ घटना बीतती है उसी को आईने की तरह सच्चाई का आभास होता है और कभी-कभी ये सच्चाई उसकी ज़िन्दगी में अनगिनत दुखों के पहाड़ ला देती है और इंसान इन दुखों का वहन करते करते कभी कभी इतना थक सा जाता है कि ज़िन्दगी से वो और ज़िन्दगी उससे जैसे पूरी तरह निराश हो। ऐसी स्थिति में ही इंसान शायद गलत कदम उठा लेता है।
ऐसा नहीं है कि वो इंसान सकारात्मक नहीं सोचता होगा। बिल्कुल सकारात्मक सोच रखता होगा। बल्कि वो एक आम इंसान की तरह आम लोगों की क़दर करना भी जानता था। पर ये फिल्मी दुनिया बड़ी खराब है कभी कभी एक आम इंसान जो मध्यम वर्गीय परिवार से हो और कड़ी मेहनत करके फिल्मी दुनिया में आया हो और एक दम से ही एक के बाद एक हिट फिल्में दे रहा हूँ। उससे बाकी कुछ चुनिंदा सितारे तो जलेंगे ही। यही हुआ एक आम शख्स के साथ जिसकी ज़िन्दगी में कोई कसर नहीं छोड़ी उसे मानसिक प्रताड़ित होने पर मजबूर कर दिया गया।
सिर्फ पैसा दौलत शौहरत यही सबकुछ पाकर इंसान खुश हो अपने जीवन  में या उसकी ज़िन्दगी चलती रही हँसी ख़ुशी ऐसा नहीं होता। असल में ज़िन्दगी की असली ख़ुशी उसके संतोषजनक काम काज में होती है। अगर इंसान का करियर चौपट हो रहा होता है ना तो उसका दिल रोता है और ख़ासकर तब जब इंसान बेहद होशियार और बेहतर आईक्यू लेवल वाला हो उसी के साथ जानबूझ कर उसे धक्का दिया जा रहा हो ताकि उसके करियर में पतन आ सके। तब इंसान वही करता है जो उसको नहीं करना चाहिए।
ज़िन्दगी के मायने बाहर से जैसे दिखते हैं वास्तव में वो वैसे नहीं होते। और जैसे असल ज़िन्दगी में होते हैं उसकी ख़बर कानोंकान नहीं लगती। यही ज़िन्दगी का बेबाक सच है।

-अतुल पाठक
हाथरस, उत्तर प्रदेश
संपर्क- 7253099710