Tuesday, June 16, 2026
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‘उरी’ के बाद बदला बॉलीवुड का डीएनए, कैसे विक्की कौशल की एक फिल्म ने राष्ट्रवाद

नई दिल्ली। कुछ फिल्में केवल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे पूरे इंडस्ट्री के लिए एक नया पैमाना तय कर देती हैं। साल 2019 में रिलीज़ हुई विक्की कौशल स्टारर ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ ऐसी ही फिल्म साबित हुई। नए निर्देशक आदित्य धर की इस फिल्म ने न सिर्फ दर्शकों की सोच बदली, बल्कि बॉलीवुड में राष्ट्रवाद और वॉर-ड्रामा को देखने का नजरिया भी पूरी तरह बदल दिया।

भावुकता से आक्रामकता तक का सफर

‘उरी’ से पहले बॉलीवुड की देशभक्ति फिल्में अधिकतर बलिदान, शांति और भावनात्मक संवादों के इर्द-गिर्द घूमती थीं। लेकिन “यह नया भारत है, यह उनके घर में घुसेगा और मारेगा” जैसे डायलॉग्स के साथ उरी ने एक नए, आक्रामक राष्ट्रवाद की नींव रखी। इसके बाद फिल्मों में हीरो सिर्फ सीमा पर खड़ा रक्षक नहीं रहा, बल्कि दुश्मन की जमीन पर जाकर निर्णायक कार्रवाई करने वाला योद्धा बन गया।
‘शेरशाह’, ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ और ‘पठान’ जैसी फिल्मों में इसी बदले हुए तेवर की झलक साफ दिखी।

रॉ और हाइपर-रियलिस्टिक एक्शन का दौर

उरी की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका तकनीकी स्तर था। नाइट विज़न कैमरे, साइलेंसर वाली बंदूकें और ज़मीन से जुड़ी लड़ाई ने एक्शन के लिए नया मानक तय किया। इसके बाद दर्शक सिर्फ स्टाइलिश फाइट या अवास्तविक स्टंट से संतुष्ट नहीं रहे।
‘बाटला हाउस’, ‘मेजर’, ‘शेरशाह’ और यहां तक कि ‘पठान’ और ‘बॉर्डर 2’ जैसी फिल्मों ने भी इसी रियलिस्टिक अप्रोच को अपनाया। उरी ने यह भरोसा दिलाया कि दर्शक बड़े स्टार से ज्यादा दमदार कहानी और असली नायकों को महत्व देते हैं।

गुमनाम नायकों की कहानियों का उभार

उरी की सफलता के बाद बॉलीवुड में रियल लाइफ हीरोज पर बायोपिक्स का सिलसिला तेज हो गया। फिल्ममेकर अब इतिहास की धूल भरी फाइलों में छिपे उन नायकों को तलाशने लगे, जिनका योगदान बड़ा था, लेकिन कहानियां अनकही रहीं।

  • शेरशाह – कैप्टन विक्रम बत्रा की वीरगाथा

  • सरदार उधम – एक क्रांतिकारी की अनसुनी कहानी

  • सैम बहादुर – फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का जीवन

  • मेजर – संदीप उन्नीकृष्णन का सर्वोच्च बलिदान

जासूसी और इंटेलिजेंस यूनिवर्स का विस्तार

‘उरी’ ने यह भी दिखाया कि आधुनिक युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि इंटेलिजेंस और डेटा से लड़े जाते हैं। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए यशराज फिल्म्स ने ‘पठान’ और ‘टाइगर 3’ से, जबकि सिद्धार्थ आनंद ने ‘फाइटर’ के जरिए एक पूरे जासूसी यूनिवर्स को खड़ा किया। अब दर्शक स्क्रीन पर रॉ एजेंट, हाई-टेक गैजेट्स और ग्लोबल मिशन देखना पसंद कर रहे हैं।

बॉक्स ऑफिस का नया गोल्डन फॉर्मूला

उरी ने यह मिथक तोड़ दिया कि 300 करोड़ क्लब में एंट्री के लिए ‘खान’ या ‘कपूर’ सरनेम जरूरी है। सही भावनाओं और मजबूत कंटेंट के साथ देशभक्ति एक सालभर चलने वाला कमर्शियल फॉर्मूला बन गई। यही वजह है कि आज अक्षय कुमार से लेकर अजय देवगन तक लगभग हर बड़ा स्टार इस जॉनर में हाथ आजमा रहा है।

हालांकि, उरी के बाद कुछ फिल्मों ने सिर्फ राष्ट्रवाद के नाम पर कमजोर कहानियां परोसने की कोशिश भी की, लेकिन दर्शकों ने समझदारी दिखाते हुए केवल गुणवत्ता वाली फिल्मों को ही सफलता दिलाई।

क्या ‘बॉर्डर 2’ उरी की विरासत आगे बढ़ा पाएगी?

‘बॉर्डर 2’ में सेना के साथ नेवी और एयरफोर्स के तालमेल को दिखाया गया है, जो उरी की रणनीतिक सोच की याद दिलाता है। जहां 1997 की बॉर्डर भावनाओं पर आधारित थी, वहीं बॉर्डर 2 में आधुनिक युद्ध की प्लानिंग और टेक्नोलॉजी प्रमुख भूमिका में नजर आती है।

आदित्य धर: सिर्फ वन-फिल्म वंडर नहीं

आदित्य धर ने उरी से जो क्रांति शुरू की थी, उसे उन्होंने अपनी अगली फिल्म ‘धुरंधर’ में और बड़े स्तर पर पहुंचा दिया। इस फिल्म ने साबित कर दिया कि धर सिर्फ एक हिट फिल्म देने वाले निर्देशक नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय सिनेमा के मजबूत स्तंभ हैं।
जहां उरी एक सीक्रेट मिलिट्री ऑपरेशन की कहानी थी, वहीं धुरंधर में अंतरराष्ट्रीय जासूसी, हाई-टेक एक्शन और रणनीतिक राष्ट्रवाद का भव्य संगम देखने को मिला।

निष्कर्ष

‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ ने बॉलीवुड को यह सिखाया कि देशभक्ति सिर्फ भावुकता नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, रणनीति और जोश का नाम है। इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को ग्लोबल स्तर पर खड़े होने का साहस दिया और यह कहना गलत नहीं होगा कि आज के राष्ट्रवादी सिनेमा की नींव ‘उरी’ ने ही रखी।

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