मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से शादी, तलाक और पारिवारिक विवादों से जुड़े मामलों में एक अहम फैसला सामने आया है। यह मामला एक आर्मी जवान और उसकी पत्नी के बीच चल रहे लंबे तलाक विवाद से जुड़ा है, जिसमें पत्नी ने फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए बच्चे के DNA टेस्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की पत्नी की याचिका?
जांच का मकसद बच्चे की वैधता नहीं, आरोपों की सच्चाई
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकलपीठ में जस्टिस विवेक जैन ने पत्नी की याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के DNA टेस्ट के आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने साफ कहा कि यह मामला बच्चे को अवैध या नाजायज घोषित करने का नहीं है, बल्कि पत्नी पर लगाए गए गंभीर आरोपों की जांच से जुड़ा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि DNA जांच का बच्ची की कानूनी पहचान या अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
DNA सैंपल देने से इनकार किया तो क्या होगा?
कोर्ट ने चेताया, पत्नी को नहीं मिलेगा फायदा
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अगर पत्नी DNA सैंपल देने से इनकार करती है, तो फैमिली कोर्ट को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(h) या नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) 2023 के तहत उसके खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगाने का अधिकार होगा। यानी, जांच से बचने की कोशिश पत्नी के पक्ष में नहीं जाएगी।
‘चार दिन में प्रेग्नेंसी’ का दावा बना केस का टर्निंग पॉइंट
मेडिकल साइंस के नजरिए से कोर्ट ने जताई शंका
मामले की सबसे अहम और चौंकाने वाली बात पति का वह दावा है, जिसने पूरे केस की दिशा बदल दी। पति ने कोर्ट को बताया कि वह भारतीय सेना में कार्यरत है और अक्टूबर 2015 में पत्नी के बुलाने पर घर आया था।
उसके लौटने के महज़ चार दिन बाद पत्नी ने उसे अपनी प्रेग्नेंसी की जानकारी दी। कोर्ट ने माना कि मेडिकल साइंस के अनुसार चार दिन में गर्भावस्था का पता चलना बेहद संदिग्ध है। इसके अलावा बच्ची का जन्म भी करीब आठ महीने बाद हुआ, जिससे पति-पत्नी के साथ न रहने की दलील और मजबूत होती है।
10 साल पुराना विवाद, तीन बार तलाक की याचिका
मामला अब भी फैमिली कोर्ट में लंबित
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पहली तलाक याचिका 2019 में दायर हुई, जिसे आपसी सहमति के आश्वासन पर वापस ले लिया गया।
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दूसरी याचिका भी 2019 में दाखिल हुई, लेकिन पत्नी दूसरी मोशन में पेश नहीं हुई, जिसके चलते मामला 2 मार्च 2021 को बंद हो गया।
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इसके बाद 2021 में तीसरी तलाक याचिका दायर की गई, जो अब तक लंबित है। इसी याचिका में DNA टेस्ट की मांग की गई थी।
हाईकोर्ट का साफ संदेश
व्यभिचार के आरोपों में DNA टेस्ट कानूनन सही
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि जब तलाक का आधार व्यभिचार हो और पति यह स्पष्ट कर दे कि बच्चे की वैधता या भरण-पोषण का कोई मुद्दा नहीं है, तो DNA टेस्ट का आदेश देना कानून के खिलाफ नहीं माना जा सकता।
कोर्ट का यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।











