Friday, April 24, 2026
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गुजरात हाई कोर्ट का अहम फैसला, एक थप्पड़ को नहीं माना ‘क्रूरता

अहमदाबाद। गुजरात हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद और आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े 23 साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए आरोपी पति को बरी कर दिया। जस्टिस गीता गोपी की बेंच ने कहा कि पत्नी को एक बार थप्पड़ मारना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता।

अदालत ने 2003 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सात साल की सजा को रद्द कर दिया और आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306) व क्रूरता के आरोपों से पति को दोषमुक्त कर दिया।

क्या था मामला?

अभियोजन के अनुसार, पति ने पत्नी को इसलिए थप्पड़ मारा था क्योंकि वह बिना बताए अपने मायके गई और वहां रात बिताई। निचली अदालत ने इसे गंभीर अपराध मानते हुए सजा सुनाई थी।

हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि पति का कोई ऐसा कृत्य था जिसने पत्नी को सीधे तौर पर आत्महत्या के लिए मजबूर किया हो।

‘मेंस रिया’ का अभाव

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में आरोपी की स्पष्ट आपराधिक मंशा (Mens Rea) साबित करना अनिवार्य है। इस मामले में ऐसी कोई मंशा सिद्ध नहीं हुई।

जांच में सामने आया कि पति अतिरिक्त आय के लिए रात में बैंजो बजाने जाता था, जिसे पत्नी पसंद नहीं करती थी। इसी बात को लेकर दोनों के बीच सामान्य वैवाहिक विवाद होते थे।

आरोपों के समर्थन में नहीं मिले सबूत

मृतका के माता-पिता ने लगातार पिटाई के आरोप लगाए थे, लेकिन कोर्ट ने पाया कि न तो कोई मेडिकल रिकॉर्ड मौजूद था और न ही समाज या पंचायत में कभी शिकायत दर्ज कराई गई थी।

अदालत ने टिप्पणी की कि सामान्य वैवाहिक अनबन को बिना ठोस साक्ष्यों के गंभीर आपराधिक कृत्य मानना कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है।

ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा

हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को “त्रुटिपूर्ण” करार देते हुए कहा कि केवल वैवाहिक विवाद को आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। आरोपी की स्पष्ट मंशा सिद्ध किए बिना दोषसिद्धि संभव नहीं है। इस फैसले को वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है।

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