अस्तित्व- प्रज्ञा मिश्रा

मैं क्या हूँ?
कौन हूँ?
कैसे हूँ?
और क्यों हूँ?
यह न सिर्फ,
अहम प्रश्न है?
जिसका उत्तर,
मैं बरसों से,
ढूंढ रही हूँ,
यह एक गूढ रहस्य है,
सर्वत्र चर्चा आम है,
कि इसका एकमेव उत्तर है…
मेरा अस्तित्व!

पर क्या यही सच है?
किसी और के,
&कथन भर से,
पता चल जाएगा
मेरा परिचय!
कैसे मालूम हो सकेगा?
यह तो,
उस दिन,
तय हो गया था,
जिस दिन,
मेरा अवतरण हुआ था।
मैं किसकी तनया हूँ,
तत्पश्चात,
मैं किसी की भगिनी,
पत्नी और माता कहलाई।
और अपने दोस्तो की,
दोस्त बनी!
पर ये सब,
मुझमें कहाँ शेष है?
खुद मे खुद भी न रही!
मेरा अपना,
अस्तित्व क्या है?
यह कि,
मैं एक इंसान हूँ
मैं एक नारी हूँ
मैं समस्त हूँ
और सशक्त भी हूँ
मैं एक बिंदु हूँ,
और सिंधु भी
मैं सीता भी हूँ,
और दुर्गा भी
मुझे मेरा अस्तित्व,
दर्शाने वालों

सुनो…
मैं तुम सबको,
आकार दे सकती हूँ,
और समय आने पर,
निराकार कर सकती हूँ
यही मेरा अस्तित्व है!
मैं स्वयंसिद्धा हूँ!
मै अस्तित्वदृष्टा हूँ।

-प्रज्ञा मिश्रा
पुणे