आर्यपुत्रों का अखंड भारत: प्रार्थना राय

अनुचित ज्ञान को
विज्ञापित करने वाले
स्वयं को ईश्वर बतलाने वाले
क्षमा करना अंग्रेजी बोलने वाले
तुम्हारे हर प्रश्न का उत्तर
हम हिन्दी में देने वाले

बेबुनियाद ढाँचे पर 
चरमराता हुआ तुम्हारा अस्तित्व
यदि सामर्थ्य है तो
आओ हमारे सामने
स्वयं को माँ भारती की संतान
घोषित करने में परहेज़ किस लिए

तुम्हारा मंच है
तुम बोल सकते हो
परन्तु स्मरण रहे तुम किसी के
अभियक्ति की स्वतंत्रता नहीं छीन सकते
घोलो खूब घोलो विष, धरा की गोद में
राष्ट्र परायणता की भीत में कितने ही करो छेद

लड़खड़ाते हुए तुम्हारे स्वर
निरंकुशता से भरी तुम्हारी सोच
राष्ट्रभक्ति की निष्ठा पर
तुम्हारा अस्थायी आक्रमण
जाली नोट की भाँति तुम्हारा आकर्षण
एक दिन तुम बिखरकर हो जाओगे निर्वासित

निम्न बहाव को लेकर
बहता हुआ तुम्हारा रक्त
जिसमें खौल रहा अर्थहीन विचार
मानवता व पराक्रम के उपकरण से
परिवर्तित कर देंगे पानी में
फिर आहार बनना समंदर के खारे पानी का

जिस दिन आर्यपुत्रों की
चेतना चिंगारी बन जागृत हुई
फिर लिखेंगे भारत के भाल पर
खिलखिलाती विहान की विवेचना
पुनः परिभाषित होंगे वो महानायक
जिनके दम पर चमकता है राष्ट्र का चंद्रमा

हर नारी बनेगी
दुर्गावती और मणिकर्णिका
हर पुरुष के हृदय में
बसेगी राणा की आत्मा
चीते की चाल पर चहकेगा
हिन्द का हर बच्चा

जब प्रत्येक व्यक्ति जुडे़गा
देशभक्ति की अनिवार्यता से
नभमंडल व धरा के मध्य
होगा अनंत विजय घोष
सभी के ललाट पर उगेगा
अखंड भारत का उदित होता दिवाकर

‘हृदय स्वर’
प्रार्थना राय
देवरिया, उत्तर प्रदेश