धरोहर: डॉ संगम वर्मा

रुमीना मैडम- संगम! ये पैन बहुत बढ़िया है, तुम्हारा है…? (आश्चर्य के भाव से ज़रूरी काग़ज़ात पर दस्तख़त करते हुए मैडम जी ने और आगे कहा) इसकी निब आगे से सिल्वर रंग की है, ढाँचा ऊपर से ब्लैक रंग का, सेंटर में गोल्डन का छल्ला है, ऊपरी ढाँचा नीले रंग का है, और इसकी टोपी गोल्डन रंग की। और इसका हुक देखो…फ्लेयर लिखा हुआ है…स्टील का है। बड़ा ही यूनीक है ये। हाथों में कैसे जल्दी पकड़ में आ जाता है, काफ़ी स्लिम सा और अट्रैक्टिव है… स्मूथ भी है। अपनी बात ख़त्म करते हुए ज़रूरी काग़ज़ों पर दस्तख़त करने में व्यस्त हो जाती हैं।

तभी प्रत्युत्तर में, मैं कह उठता हूँ-
जी मैडम जी, दरअसल ये पिछले दीक्षांत समारोह में एक बच्चे ने तोहफ़े में दिया था, यह कहते हुए कि सर! आप लिखते हो न, तो आपके लिए ये मेरी ओर से… तब से इस क़लम के साथ और सम्बन्ध गहरा हो गया है।

जब भी मैं कोई आलेख लिखता हूँ या कोई विचार पन्नों पर उकेरता हूँ तो इसका साथ बराबर रहता है। तो ज़ेहन में उसी लड़की की तस्वीर सामने हो आती है, रूबल नाम है उसका अपने ही कॉलेज से उत्तीर्ण हुईं हैं, दिल्ली में आजकल तैयारी कर रही हैं, तो मिलने आयीं थीं डिग्री लेने अब ये क़लम नहीं धरोहर बन चुकी है, जिसने बड़े प्रेम और नज़ाकत के साथ ये दिया था।

डॉ संगम वर्मा
सहायक प्राध्यापक
हिंदी विभाग
पीजीजीसीजी-42, चंडीगढ़