ऐ ग्राम तुझे प्रणाम: सुजाता प्रसाद

बिछ रही नर्म घास की हरी हरी चादर मेड़ क्यारियां लहरा रहीं जैसे मां का आँचल

ऐ ग्राम तुझे प्रणाम, है तुझे प्रणाम
तेरी चंदन सी माटी पर है अभिमान
खेत खलिहान झूमते किसान,
फसलों में छुपे जिनके अरमान।
पशुओं का भोलापन हर दालान,
पंछियों का चहकना खुला आसमान।
ऐ ग्राम तुझे प्रणाम, है तुझे प्रणाम
तेरी चंदन सी माटी पर है अभिमान।

बिछ रही नर्म घास की हरी हरी चादर
मेड़ क्यारियां लहरा रहीं जैसे मां का आँचल
जल प्लावित पोखर, खुशरंग पनघट-सरवर
भींगे मन, सुन चैता सोहर होरी कजरी के स्वर
ऐ ग्राम तुझे प्रणाम, है तुझे प्रणाम
तेरी चंदन सी माटी पर है अभिमान।

मुनि सी जटा मक्के की,
त्रिशूल सी उसकी बाली
लहराई धान की हरियाली
गेहूँ सुनहरी कभी इठलाई
ऐ ग्राम तुझे प्रणाम, है तुझे प्रणाम
तेरी चंदन सी माटी पर है अभिमान।

मदमस्त आम की अमराई
घुली मधुर मिठास गन्ने की,
ख़ूशबू फूलों की भीनी भीनी
बाँस की घनी हवा बलखाई
ऐ ग्राम तुझे प्रणाम, है तुझे प्रणाम
तेरी चंदन सी माटी पर है अभिमान।

कण कण में अपनापन है बसता
बसते जहाँ घट घट में राम रहीम
ख़ुश है हर घर, गुंजित हर आंगन
विहँस रही, बन हर दिशा नवीन
ऐ ग्राम तुझे प्रणाम, है तुझे प्रणाम
तेरी चंदन सी माटी पर है अभिमान।

सुजाता प्रसाद
नई दिल्ली