दुनिया के स्वप्नों को
उत्तम आकार देने के लिए कवि न जाने
कितनी ही रातों को नष्ट करता है,
तब जाकर एक कविता लिखता है
शब्दों को चुन- चुन कर तैयार करता है
कविता की सरिता तब कहीं
परिश्रम के रंगात्मक उद्देश्य को,
साहित्य के सिंधु का मिलता है आश्रय

रात की काली तहों को
उकेरता है एक कवि
जो निश्छल हृदय का स्वामी है
समेटता है एहसास के आँचल को
और चुनता है कुछ सपनों के पुष्प
बटोरता है दर्पण समान टूटे मन के टुकड़े
थोड़े खुशी के पल थोड़े से गम और
चुपके-चुपके शब्दों के रेशमी पैबंदों को इकट्ठा करता है

रात की भीड़ में भी एकांत का अधिकरण कर
सन्नाटों से निकलती है एक मधुर ध्वनि
अकेलेपन की चादर में खुद को लपेटे हुए
कवि के होंठों पर हल्की मुस्कान आती है
तब मुस्कान के फव्वारे से बनाता है स्याही
हृदय की कलम से दरकी हुई
सांत्वना की दीवार  पर
रचता है अपनी उम्मीद की कविता

मन ही मन कल्पित नायिका की
प्रतीक्षा में अपने आप से बातें करने लगता है
मध्य रात्रि के जागरण में
गढ़ता है विराहा का कलश
अश्रुओं में डूब जाती है कवि की आँखें
झील में परिवर्तित हुई अश्रु धारा
और फिर अश्रु सिक्त धरा पर बोते हैं
नव विहान का बीज

प्रार्थना राय
देवरिया, उत्तर प्रदेश