बरगद की छांव: सुप्रसन्ना झा

परिचय
श्रीमती सुप्रसन्ना झा
जन्म- सहरसा, बिहार
शिक्षा- स्नातक, संगीत- प्रभाकर, प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद
संप्रति- देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन
प्रकाशन-
मैथिली पद्य-संकलन
काव्य-प्रणिका
काव्य-रश्मि
राष्ट्र के नाम मेरी भी एक कविता पद्य-संकलन
जानकी करथि पुकार
जनक नंदिनी जानकी

बरगद की छांव

दायित्व- निर्वहन के सच्चे सारथी हैं पिता
मौन होकर जो कर्तव्य निभाये
वो महारथी है पिता
कभी बरगद की छांव तो कभी नीम सा सुखद अनुभूति हैं पिता
अगर शिशुओं की पालक है माँ तो उनके पालनहार पिता
जगतविदित है कृष्ण की जन्मदात्री तो माँ थी लेकिन
प्राणरक्षा हेतु यमुना पार कराने वाले थे पिता
श्रीराम भले ही कौशल्या के पुत्र थे लेकिन
राम-राम की रट लगाकर प्राण तजने वाले थे पिता
कठोरता और मृदुता के मिश्रण हैं पिता
इसलिये मेरी नजर में
पिता धर्मः
पिता स्वर्गः
पिता हि परमं तपः

पतझड़

पतझड़ अक्सर हमें संदेशा देती है
झड़-झड़कर
नव पल्लव
नव कोंपल
नव जीवन
नव सृजन का

बदलते रंग

रंग तो बहुत है दुनिया के लेकिन
ये बदलते रंग जिसे देख गुम हो जाते है हम, कभी काले
कभी नीले,
कभी पीले,
कभी हरे तो
कभी लाल
जो सच में
बेहद ही कमाल
इन सबसे अलग इक रंग होता है विश्वास का
जो नहीं ठहरता कभी नहीं ठहरता
इन बदलते रंगों के बीच,
विश्वास का रंग

इंद्रधनुष

देखो न…
कितने सजीले रंग है इंद्रधनुष के
सातों रंगों ने समानता दिखाई
फिर जाकर
ये रंग निखरें हैं
अनुपम छटा बिखरी है
एक हम हैं अलग-अलग
फिर कैसे रंग निखरेंगे समानता के

सुप्रसन्ना झा