प्रथम भेंट: सुप्रसन्ना झा

श्रीमती सुप्रसन्ना झा
जोधपुर, राजस्थान

तुम्हारी आंखों में कितनी उत्सुकता थी
किंतु मैं दृष्टि झुकाये चुप्प, मौन
तुम बोलने को तत्पर
जानने को उत्सुक
उस दिन वक्त जैसे ठहर सा गया था
तुम प्रश्नचिन्ह के साथ
और ,
मै अनुत्तरित
हमारे दरम्यान सिर्फ जिज्ञासाएं
पंख पसारे बैठी थी
उस पंछी की तरह
जो पंख होते हुए भी
उड़ान भूल गया हो
सब कुछ रुक गया हो
ना वक्त का खबर
ना कहने की
ना सुनने की
परवाह थी तो बस
क्या बोलें
कैसे बोलें
हमारी-तुम्हारी प्रथम भेंट