विरह के आग में जलते-जलते- शिवम मिश्रा

विरह के आग़ में जलते-जलते
उस दिन मैं काफ़ी दूर आ गया था
वो वीरान और ख़तरनाक जंगल था
वहां मैं कब कैसे पहुंचा मुझे खबर नहीं
जहां सिंह की दहाड़ और झिंगुरों की कर्कश आवाज थी
दिन में भी घनघोर अंधेरा और हो रहीं तेज़ बारिश थी
मैंने प्रकृति के इस रूप का अभिवादन किया
प्रकृति भी ख़ुश हो कर मुझ पर पुष्प वर्षा कर रही थी
मैं ख़ामोश हो कर ये सब चमत्कार देखता रहा
कोयल कोई गीत गा रही थी, मयूर नृत्य कर रहे थे
तभी एक तेज़ रोशनी मेरे आँखों से टकराई
ओह ये क्या मेरी आँखें ये सब सपने में देख रही थी

-शिवम मिश्रा ‘गोविंद’
मुंबई, महाराष्ट्र