भारतीय मजदूर और अफ्रीकन बाजार- वीरेन्द्र तोमर

रोजगार के लालच में आज विदेशों में भारत के लाखों मजदूर फंसे हुए हैं वह अपने देश वापस लौटना चाहते हैं, किंतु लाख लोगों के चक्कर में वापस नहीं आ पा रहे दक्षिण अफ्रीका के अंतर्गत नाइजीरिया के लागोस में स्थित डीओआरसी ऑयल रिफायनरी, जोकि लेखी फ्री जोन में स्थित है, वहां पर लगभग 18000 भारतीय काम करते हैं। वह सभी प्लांट के अंदर बाउंड्री करके रखे गए हैं, उनके बाहर जाने पर भी प्रतिबंध है तथा कोरोना जैसी महामारी की विषम परिस्थिति में अभी वह निरंतर काम कर रहे हैं।
यह मजदूर भारत की कंपनी पावरमैक, कैमिटेक, आफसोर, ऑनशोर, इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड, शापूरजी पालन जी कंपनी लिमिटेड जैसी अनेक कंपनी के अंतर्गत काम कर रहे हैं। यह सभी मजदूर अफ्रीकन मजदूरों के साथ मिलकर एक साथ काम करते हैं, जैसा कि हम जानते हैं। नाइजीरिया एक निहायत गरीब देश है और वहां टेक्निकल हैंड्स की बड़ी कमी है।
अफ्रीका की 10 परसेंट के लगभग आबादी एड्स जैसी घातक बीमारी से अफेक्टेड है। क्राइम रेट नाइजीरिया का सर्वाधिक है। वहां मजदूर जल्दी से बाहर भी नहीं निकल सकते हैं और बाहर निकलने पर लोकल से उनकी जान का खतरा रहता है, अतः लैंड के अंतर्गत ही रह कर अपने काम को संपादित करते हैं।
हालांकि यह सारी कंपनियां इनके खाने-पीने का इंडियन भोजन की की व्यवस्था करवा कर रखी हैं। इन्हें खाने पीने रहने तथा वेतन की कोई तकलीफ नहीं है भारत की धरती से दूर जब मजदूर दूसरे देश में काम करता है तो उसे अपने देश की याद सताने लगती है।
लगभग 10000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नाइजीरिया से भारत आने जाने का जल हवा हवाई मार्ग का ही साधन है। आज क्रोना वायरस के चक्कर में सारी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द चल रही है और जब लाख डाउन खुलेगा सभी इन मजदूरों की भारत वापसी संभव है इन मजदूरों में ज्यादातर उत्तर प्रदेश और बिहार के श्रमिक काम करते हैं।
जब वह भारत का हाल टेलीविजन और व्हाट्सएप और टेलीफोन के माध्यम से जब सुनते हैं वा घर वापसी की जिद करते हैं व्यापार के दृष्टिकोण से यदि हम सोचे जो अफ्रीकाभारतीयों के लिए एक बहुत ही उपयुक्तबाजार है। लगभग 10 लाख के करीब भारतीय लागोस में ही रहते हैं। नाइजीरिया के अलावा अन्य देशों में भी भारतीय फैले हुए हैं जैसे मोरक्को, कीनिया, जोहानस्वर्ग, सूडान, जांबिया, लीबिया, जैसे देशों में भी फैले हुए हैं।
इन मजदूरों की कमाई से भारत को काफी विदेशी मुद्रा का लाभ मिलता है इन देशों में भारतीय दूतावास भी अच्छी तरीके से भारतीयों के हितों की रक्षा करता है। दक्षिण अफ्रीका में चाइना के वर्कर्स की भी भरमार है चाइनीस कंपनियां अपने हर्ष बाजार का एक बहुत बड़ा क्षेत्र बना के रखे हुए हैं।
वहां भारतीयों ने घुसने में एक अभूतपूर्व सफलता पाई है आज समय आ गया है कि कोरोनावायरस के चक्कर में यदि चाइना बाहर भागता है अफ्रीका से तो भारतीयों के लिए बहुत बड़ा बाजार खुल जाएगा लगभग दो करोड़ से भी ज्यादा भारतीयों को इन देशों में रोजगार मिलने में कोई कठिनाई नहीं होगी हमें जरूरत है कि आज हमारे भारतीय बेरोजगारों को टेक्निकल हैंड बनाया जाये।
हमारे देश की विडंबना है कि असंगठित क्षेत्र के मजदूर विदेशों में काम कर रहे हैं जिनको हिंदुस्तान में रोजगार नहीं मिलता है वह भी देश की तरफ भागते हैं तथा अच्छा पैसा कमाने की होड़ में वही बस जाते हैं।
भारतीयों के काम का कोई जवाब नहीं है भारतीय मजदूर इतने अच्छे से इतना अच्छा वहां काम करते हैं। जिसकी तुलना दुनिया का कोई भी देश नहीं कर सकता है। किंतु हमारी सरकार ही परम जिम्मेदारी होनी चाहिए कि विदेश में कार्य कर रहे भारतीयों के परिवारों की सरकार देखरेख करे।
ताकि ज्यादा से ज्यादा हमारे लोग अफ्रीका में जाएं और वहां सकुशल काम करके घर वापस आए तो उनका खेलता जीता जागता परिवार अच्छे से उनको मिले उनके बच्चों की परवरिश अच्छी शिक्षा अच्छी चिकित्सा के संसाधन सरकार उपलब्ध कराएं साथ ही भारतीय कंपनियां जो विदेश में काम कर रही है वह मजदूरों के हितों का ध्यान रखें और मजदूरों को निर्धारित वेतनमान उनका भुगतान किया जाए इससे विदेशी मुद्रा कोष का इजाफा होगा और भारत की इकोनॉमी मजबूत होगी।
यह कहना हमारा बिल्कुल अनुचित नहीं होगा कि कोरोनावायरस भारत के लिए एक बहुत बड़ा वरदान साबित हो सकता है आने वाले समय में अफ्रीका और यूरोप देसी देशों में भारत के मजदूरों की परम आवश्यकता होगी और भारत को यदि देने में सक्षम हो गया तो अगले 10 वर्ष के अंतर्गत भारत की इकोनॉमी एक दुनिया में सबसे मजबूत हो जाएगी।
इसके लिए कौशल विकास की परम आवश्यकता है ताकि हमारे मजबूर टेक्निकल हैंड्स बन सके और अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर खरे उतरें।
आज अफ्रीकन देशों में भी चाइना भगाओ का अभियान बड़ी तेजी से शुरु हो चुका है और अब आने वाला भविष्य भारत के लिए स्वर्णिम साबित हो सकता है बस जरूरत है कि भारत को थोड़ा विदेश नीति में परिवर्तन करके और अफ्रीकन देशों को अपने गले में लगाने की आवश्यकता है ताकि चाइना बाजार बाहर किया जा सके और भारती प्रोडक्ट को इंट्री मिले।
मैंने स्वयं भी घूम के इन देशों में देखा है कि अफ्रीकन कम्युनिटी का बड़ा लगाओ रहता है यहां तक कि वह हिंदी भी बोलते हैं और रिस्पेक्ट भी देते हैं।
आज भारत के अंतर्गत एमएसएमई से पंजीकृत माइक्रो स्केल की कंपनियों को प्रमोट किया जाए उन्हें गवर्नमेंट संसाधन मुहैया कराए ताकि वह छोटे-छोटे ट्रेड सेंटर से वेल्डर फिटर ग्राइंडर गैस कटर प्लंबर इलेक्ट्रीशियन ड्राइवर आज को तैयार करें और और उनको विदेशों में रोजगार मिलने में सहायता प्रदान करें साकी भारत के उज्जवल भविष्य को बनते देर नहीं लगेगा भारत आने वाले 10 से 15 वर्षों में दुनिया में सबसे बड़ा आर्थिक क्षेत्र में मजबूत देश के रूप में नजर आने लगेगा और भारत विश्व गुरु बन जाएगा।
एमएसएमई के अंतर्गत आने वाली माइक्रोस्केल की कंपनियों को सरकार सरलता से बिना किसी कोलेट्रल सिक्योरिटी के लोन उपलब्ध कराएं तथा उनको कौशल विकास की ओर से अमित करवाएं ताकि वह एक अच्छा अंजाम दे सके और उन्हें विदेशों में जाकर काम करने में सरलता से उनको लाइसेंस भी उपलब्ध कराएं स्माल और मीडियम क्लास की कंपनियां इतनी मजदूरों के लिए सहायक नहीं होगी जितना की छूट सबसे छोटी छोटी कंपनियां जो है मैं सभी में है वह लाभदाई होंगे।
मीडियम और स्माल स्केल की कंपनियों को उद्योग में लगने वाले प्रोडक्ट के निर्माण हेतु सरकार प्रेरित करें तथा माइक्रोस्केल की कंपनियां जो कि बहुत ही छोटी छोटी कंपनियां हैं जिनका की टर्नओवर एक करोड़ से भी कम हो तो उन कंपनियों के अंतर्गत मेन पावर का चयन उनको विदेश में ले जाए कि उन से काम करवाने की जिम्मेदारी उन कंपनियों को सौंपी जाए।
इससे भारत भारत के असंगठित मजदूरों को सरलता से रोजगार मिलने लगेगा और वह भारत की दिशा दशा बदलने में कामयाब होंगे।

-वीरेंद्र तोमर
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