मजदूर कंस्ट्रक्शन का वास्तविक हीरो- वीरेन्द्र तोमर

देश का मजदूर आज परेशान है, वह वेतन न मिलने के कारण अपने अपने घर जा रहा है, किंतु हमारे श्रम विभाग व प्रोविडेंट फंड विभाग के कानों में जूं नहीं रेंग रही है। मजदूर के हितों की रक्षा हेतु लेबर डिपार्टमेंट तथा प्रोविडेंट फंड डिपार्टमेंट आज ऐसी विषम परिस्थिति में चुपचाप बैठा हुआ है सब जानते हुए भी अनभिज्ञ बना हुआ है।
क्या सभी कंपनियों को लेटर जारी करके यह जानकारी नहीं कर सकता है कि भारत सरकार का स्पष्ट निर्देश था कि कोई भी लेबर ना निकाला जाए तथा उनको वेतन दिया जाए परंतु आप ने इसके ठीक विपरीत क्यों ऐसा काम किया है।
श्रमिकों को श्रम विभाग विभाग से व प्रोविडेंट फंड विभाग से कोई सहारा न मिलता देख वह सब हतोत्साहित होकर अपने-अपने घरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जबकि यह दोनों विभाग के बीच  आए होते तो शायद मजदूरों का पलायन रोका जा सकता था। किंतु यह सब कंपनी के मालिकों से मिले हुए हैं जिस कारण मजदूर का कोई भी गार्ड फादर नहीं बचा है और बेचारा मजदूर बेसहारा महसूस कर अपने अपने निज गांवों को लौटना चाह रहा है।
लेबर डिपार्टमेंट व प्रोविडेंट फंड डिपार्टमेंट का बहुत ही नेगेटिव रोल रहा है इसी कारण लेबर में अराजकता फैली है मजदूर घरों की ओर पलायन कर रहे हैं। मजदूर बेचारा सड़कों पर मारा घूम रहा है पुलिस की लाठी डंडों को खा रहा है और कोई उसे साधन नहीं मिल रहा है जो अपने घर में लौट सकें, किंतु हमारी सरकार कुछ भी उन्हें सहारा न देकर केवल बस भोजन का पैकेट बांटना चाह रही है जिससे उनका भला होने वाला नहीं है।
क्या देश की केंद्र सरकार तथा प्रदेश की सरकारें इन सभी कमिश्नरी को तलब कर आख्या नहीं मांग सकती, कि आपके यहां  मजदूर गया है तो क्यों गया, उसके पीछे क्या कारण है। वास्तविकता का यदि पता लगाया जाता तो सरकार को मालूम हो जाता है कि इन एंप्लायर व फैक्ट्री मालिकों ने मजदूरों को स्वयं ही बेघर कर दिया है। मजदूरों को अनाथ बना दिया है और वह अपने घरों की ओर पलायन करने हेतु मजबूर हो गए हैं।
लेबर डिपार्टमेंट यदि फैक्ट्री मालिकों व  ठेकेदारों से यदि रिपोर्ट मंगाता कि आप पिछले महीने की वेजेस शीट भेजो सीट हमारे यहां प्रस्तुत करो, आप ने कितनी लेबर को पेमेंट दिया है यदि पिछले दो-तीन महीनों की पेमेंट सीट व बैंक स्टेटमेंट मंगा लेता दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता। पता चल सकता था कि हमारी लेबर के साथ कितना बड़ा इंसाफ  इन फैक्ट्री मालिकों ने किया है। प्रोविडेंट फंड डिपार्टमेंट भी इन फैक्ट्री मालिकों से डाटा मंगवा सकता था, कि ठीक है गवर्नमेंट ने निर्णय लिया है कि पीएफ का पैसा गवर्नमेंट 3 महीने के लिए जमा करेगी किंतु डाटा इन फैक्ट्री मालिकों को, ठेकेदारों को कंपनी वालों को ही देना था।
यदि डाटा मंगाया होता तो पता चलता है कि किस आदमी कितना पीएफ का कंट्रीब्यूशन बनता है तभी तो सरकार उसको लाभ दे पाती। इसी से वास्तविकता का पता चल सकता था। मज़दूर को वास्तविक रूप से भुगतान इस तालाबंदी के समय का किया गया है या नहीं किया गया। प्रदेश की पुलिस डिपार्टमेंट को भी चाहिए था, मज़दूर भागकर सड़कों पर चौराहों पर पहुंचा है तो आखिर कहां से आया है, किस कारण क्या इनकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि मज़दूर के जाने के जड़ तक पहुंचे और उसका पता लगाएं कि कौन सी फैक्ट्री में लोग काम कर रहे हैं। इनको क्यों वेतन नहीं दिया गया है और श्रम विभाग को सूचित करता है।
अभी लॉकडाउन पीरियड की वजह से मज़दूर श्रम आयुक्तों के पास नहीं जा सकता था। पुलिस वालों की तो जिम्मेदारी बनती थी। कम से कम थे उनके साथ बर्बरता पूर्वक व्यवहार  करने की जगह सदभावनापूर्वक पेश आना चाहिए था तथा उनकी मदद करना चाहिए थी।
क्या प्रदेश की सरकार व देश की सरकार को इस पर चिंता नहीं करनी चाहिए थी? क्या उनके मंत्री, सांसद और विधायक क्षेत्र में नहीं रहते हैं? क्या उनको इन समस्याओं का पता नहीं है? आखिर मज़दूर फैक्ट्रियों से क्यों भाग रही है। यदि फैक्ट्री मालिक मजदूरों को वेतन नहीं दे रहे थे तो फैक्टरी मालिकों को बुलाकर कमिश्नर्स के द्वारा उनसे सरकार को बात करना चाहिए तथा इसका हल निकलवाना चाहिए था ना कि मजदूरों के साथ अत्याचार करना चाहिए था।
इससे पता चलता है कि हमारी वर्तमान सरकार व प्रदेश की सरकारें  मजदूरों के प्रति कितनी सजग व संवेदनशील हैं। आज देश का मजदूर अनाथ होकर बच्चों के साथ पैदल पैदल हजारों किलोमीटर चलकर अपना घर में पहुंचना चाहता है, कोई रास्ते में दम तोड़ रहा है। किंतु हम एक सद्भावना व्यक्त करने के अलावा कुछ दूसरा काम नहीं कर पा रहे हैं ! जिससे कि मजदूरों को राहत मिले तथा भला हो उनका। मजदूरों के प्रति सरकार द्वारा बनाई गई उनके हितों की नीतियां क्या मात्र कागज पर ही सिमट के रह गई है? आखिर हमारी सरकार कब जागेगी।
समय रहते सरकार को अब तक तत्परता दिखा कर संवेदनशीलता के साथ इन फैक्ट्री मालिकों को कड़ा संदेश व आदेश जारी करना चाहिए कि जो मज़दूर गए हैं, उसका तत्काल उन्हें भुगतान किया जाए और उन सभी को को वापस बुला कर काम पर लगाया जाए। तभी हम कोरोना जैसी घातक बीमारी से लड़ पाएंगे।
यह देखा गया है कि मार्च माह का भुगतान तो शायद ज्यादातर कंपनियों ने और ठेकेदारों ने कर दिया है किंतु अप्रैल से उनको अनाथ बना कर छोड़ दिया है। मजदूर परेशान घूम रहा है और ठेकेदार और फैक्ट्री वाले के बीच में वार्तालाप चल रहा है कि फैक्ट्री हमको पैसा देगा तो हम मजदूर का भुगतान करेंगे। फैक्ट्री मालिक बोलता है कि यदि हमें सरकार अनुदान देगी तो हम ठेकेदारों को पैसा देंगे। सरकार और प्रदेश सरकार के ऊपर ही घड़ी की सुई दिखती है और कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पा रहा है  मजदूर विचारा मारा जा रहा है।
फैक्ट्री मालिकों तथा सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि श्रमिकों के बिना कोई भी आप सपना साकार नहीं कर पाओगे। श्रमिक यदि नहीं है तो आप निर्माण नहीं कर पाओगे। आप अपनी फैक्ट्रियों को नहीं चला पाओगे। मजदूरी ही कंस्ट्रक्टिव इंडिया का सही हीरो है, किंतु उसके हितों की रक्षा नहीं की जा रही है और हीरो को जीरो बना दिया गया है।
पीएफ कमिश्नर व लेबर कमिश्नर ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, यह सब लीपापोती करने में लगे हुए हैं और मजदूर विचारा परेशान है तथा प्रशासन के डंडे भी झेल रहा है। सरकार को चाहिए कि तत्काल इस पर ध्यान दें और ठोस कदम उठाए ताकि मजदूरों को राहत मिल सके और बंद पड़े उद्योग चालू हो सके। मज़दूरों का पलायन रोका जा सके।

-वीरेन्द्र तोमर