रिसर्च एवं डेवलपमेंट पर ध्यान दे सरकार- वीरेंद्र तोमर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा राष्ट्र के संबोधन में कही गई बात कि भारत में कुटीर उद्योगों के माध्यम से लोकल प्रोडक्ट बनाया जाए। जिसमें उसकी गुणवत्ता का ध्यान रखा जाए तथा लोकल बनाया हुआ प्रोडक्ट को ग्लोबल  मार्केट में ले जाकर के भारत उसे बेचेगा तो निश्चित ही विकास के नए आयाम खुलेंगे।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लोकल, ग्लोबल, वोकल पर काफी जोर दिया गया। यह मानने वाली बात भी है। हमारे देश की जनता यदि कुटीर उद्योगों पर ध्यान दें तथा उन कुटीर उद्योगों के द्वारा बनाए गए प्रोडक्ट को गुणवत्ता और मानक के आधार पर निर्माण करें, तो हम अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने प्रोडक्ट के लिए जगह बना सकते हैं।
कुटीर उद्योग रोजगार का सृजन करता है. किंतु इसके लिए आवश्यक है कि हमारे पास रिसर्च और डेवलपमेंट की संस्थाएं भी देश में खड़ी की जाए ताकि वह संस्थाएं लोकल प्रोडक्ट को बनाने के लिए सहयोग प्रदान कर सकें। रिसर्च और डेवलपमेंट की कमी के कारण हमारे प्रोडक्ट ज्यादातर विश्व की बाजार में फेल हो जाते हैं और यदि फेल नहीं भी होते हैं गुणवत्ता के आधार, पर किंतु उनकी कीमतें इतनी ज्यादा होती है कि लोग उसे खरीद नहीं पाते हैं।
यदि इसके पीछे देखा जाए तो वास्तविक हमारी कमी रिसर्च और डेवलपमेंट की ही नजर आती है। यदि रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए हमारी सरकार ध्यान दें तो लोकल प्रोडक्ट की गुणवत्ता सुधरेगी तथा उसकी मैन्युफैक्चरिंग कास्ट भी बहुत इकोनॉमिकल होगी। तभी हमारे प्रोडक्ट अंतर्राष्ट्रीय मानक के आधार पर खरे उतर सकते हैं तथा उनकी कीमतें भी बढ़ी किफायती होंगी तभी हम अंतरराष्ट्रीय बाजार में विभिन्न देशों की  प्रतिस्पर्धा में खरे उतर पाएंगे।
वर्तमान में वायरस के द्वारा फैलाई गई विश्व में महामारी ने समस्त देशों के ताना-बाना को बिगाड़ कर रख दिया है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार बिल्कुल शून्य पर पहुंच चुका है। जिसका असर पूरे विश्व के बाजारों पर पड़ रहा है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। इस महामारी में लोगों को एक नई जिंदगी जीने की ओर प्रेरित किया है। लगभग 52 दिनों की तालाबंदी ने लोगों को झकझोर के रख दिया है। आज हमें आवश्यकता है कि छोटे उद्योगों पर बल दिया जाए और कुटीर उद्योगों के माध्यम से ही देश का सच्चा विकास संभव है।बहमारी सरकार को चाहिए को ऑपरेटिव सोसाइटी को बनवाने में तवज्जो  दे। उनको कुटीर उद्योग लगाने पर बल दे तो रोजगार जैसी समस्या का समाधान खंगाला जा सकता है।
हमारे देश में अब कोई 12 घंटे काम करना नहीं चाहता है भले ही आप उनको जबरदस्ती रोक के रखो किंतु वास्तविक देखा जा रहा है कि 6 घंटे से ज्यादा कोई भी अपने काम को संपादित नहीं करता है। हाल ही में भारत के विभिन्न प्रदेशों की कुछ सरकारों ने श्रम कानून में काफी फेरबदल किया है. जिसमें 12 घंटे काम करने की प्रतिबद्धता जताई गई है। जो कि निहायत गलत ही है। भारत के गांव में एक कहावत प्रचलित है कि “धरे ,बांदे बाजार नहीं लगाई जा सकती है।
हमें अंतरराष्ट्रीय श्रमिकों के हित में बनाए गए कानूनों को ध्यान में रखकर ही फेरबदल करना चाहिए जिससे कि अंतरराष्ट्रीय श्रम कानूनों का उल्लंघन भी नहीं होगा और देश में नए कानून प्रभावी ढंग से लागू किए जा सकते हैं। नए  श्रमिक कानूनों पर एक खुली बहस होने की आवश्यकता है और उस बहस से जो निर्णय लगे निकले उसे लागू करने की जरूरत है। तभी सभी को के मन में सरकार के प्रति विश्वास जागेगा और श्रमिक जन अपनी सामाजिक सुरक्षा का एहसास कर पाएंगे।
श्रमिकों को 12 घंटे की जगह पर यदि 6 घंटे का ही काम लिया जाए, श्रमिक खुशी से स्वीकार कर लेंगे। किंतु उनका वेतन भी 6 घंटे के अनुसार ही उन्हें दिया जाना चाहिए. हमारे कारखाने 24 * 7 के आधार पर काम करें 6 घंटे की शिफ्ट हो, 6 घंटे पर शिफ्ट बदलती रहे। इससे लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे देश की बेरोजगारी 10 से 15 दिन के अंदर सरकार चाहे तो खत्म कर सकती है और हमारे उपलब्ध संसाधनों में ही बेरोजगारों को रोजगार देकर समायोजित करने का रास्ता आसान हो सकता है। 6 घंटे की शिफ्ट का बनाया जाना श्रमिकों के मानदेय को कम किया जाना तथा  श्रमिकों के कानूनों का सही संरक्षण देना व बेरोजगारी  को देश से खत्म कर देना कि हमारी सरकार की प्राथमिकता हो। तभी एक नए भारत का निर्माण संभव हो पाएगा। हमारे कारखाने  24 घंटे प्रोडक्शन करें। इससे देश की उत्पादकता स्वता ही बढ़ जाएगी और उसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।  जब मजदूर 6 घंटे काम करेगा तो निश्चित है कि  काम को अच्छे से संपादित करेगा और अपनी पूरी क्षमता के अनुसार प्रोडक्शन पर ध्यान देगा।
सभी कारखानों की उत्पादकता बढ़ जाएगी देश के कारखानों में उत्पादित किए हुए सामान को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ले जाना और बेचने में सरकार सार्थक भूमिका निभाएगी। सुनिश्चित ही भारत विकास की एक नई बुलंदियों पर पहुंच जाएगा। इंडिया के प्रोडक्ट पूरी दुनिया में उपलब्ध होंगे आज चाइना विश्व के बाजार पर अपना कब्जा कर रहा है, अब हम मूकदर्शक बनकर हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते। हमें चाइना से भी कुछ ना कुछ सीखना चाहिए। चाइना के द्वारा निर्मित प्रोडक्ट देखने में काफी सुंदर तथा दामों में सस्ते होते हैं इन प्रोडक्ट्स के निर्माण में चाइना के अंदर रिसर्च एंड डेवलपमेंट की टीम एक बहुत ही अहम भूमिका निभाती है। वह किसी भी प्रोडक्ट के निर्माण के पहले रिसर्च टीम उस प्रोडक्ट के क्वालिटी और उसकी क्वांटिटी तथा उसकी गुणवत्ता पर गहन अध्ययन करती है, फिर वह प्रोडक्शन के लिए कारखानों में दे देती है। जिससे कि चाइनीस प्रोडक्ट एक काफी सस्ते में बाजार में उपलब्ध होते हैं। इसकी सस्ती कीमतों के पीछे उसकी  रिसर्च एंड डेवलपमेंट एक अहम भूमिका निभाती है।
भारत में कारखाने लघु उद्योग तो लगा दिए जाते हैं, किंतु रिसर्च एंड डेवलपमेंट की कमी बनी रहती है। जिसकी वजह से भारतीय प्रोडक्ट की प्रोडक्शन कॉस्ट काफी ज्यादा होती है। प्रोडक्ट की प्रोडक्शन कॉस्ट को घटाने के लिए मजदूरों के वेतन को कम करना कोई समझदारी नहीं है। रिसर्च एंड डेवलपमेंट को खड़ा करके कैसे सस्ते दामों में प्रोडक्ट अच्छे बनाए जाएं उस पर ध्यान देने की जरूरत है।
▪︎रिसर्च एंड डेवलपमेंट के ऊपर जोर देना
▪︎उद्योगों को कोऑपरेटिव सोसाइटी इसके द्वारा संचालित कराना
▪︎श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना
▪︎श्रम कानूनों को और पुख्ता तथा मजबूत बनाना
▪︎ उद्योगों  को 24 * 7 चालू रखना
▪︎ 6 घंटे की शिफ्ट बनाना
▪︎ प्रोडक्ट्स की गुणवत्ता तथा कीमत को कंट्रोल करना.
▪︎ को ऑपरेटिव सोसाइटी   फूड एक्ट के निर्माण में उपयोग होने वाली मशीनरी को उपलब्ध कराना
▪︎ उद्योगों को संसाधन मुहैया कराना।

सरकार के द्वारा दी गई 20 लाख करोड़ की राहत वास्तविक आजाद भारत के लिए यह एक अनोखा कदम है। लगभग 3 ट्रिलियन का  का अनुदान देश को दिया जाना नए भारत के  निर्माण में सहायक भूमिका निभा सकता है। किंतु सरकार को उपर्युक्त दिए गए बिंदुओं पर गहनता तथा गंभीरता के साथ विचार करना होगा। तभी हमारे सार्थक परिणाम निकलेंगे और देश खुशहाल बनाया जा सकता है। निजी तौर पर खड़े किए गए कारखाने कभी भी मजदूरों का भला नहीं चाहेंगे यह केवल कोऑपरेटिव सोसाइटीज के द्वारा ही संभव है. निजी तौर पर काम करने वाले लोग अपने निजी परिवार का विकास देखते हैं,  किंतु को-ऑपरेटिव सोसाइटी में सभी का विकास होता है।

 -वीरेंद्र तोमर